Saturday, 11 January 2014

विस्थापन का दर्द: वास्तविक या कृत्रिम ।
मुज्जप्फर नगर दंगों के बाद बडी संख्या मे मुसलमानों का पलायन हुआ और वे निकटवर्ती शांत क्षेत्रों मे तात्कालिक रूप से रहने लगे। ऐसे लोगों की हालत दयनीय थी। उनकी स्थिति को देखकर मन करूणा से भर जाता था, यहाँ तक कि तटस्थ हिन्दुओं का भी। ऐसे पलायन कर चुके कुछ लोगों मे से, कुछ लोग अपने-अपने घरों मे वापस चले गये। यद्यपि उन्हें वापस जाने मे भी डर लग रहा था, लेकिन वे कुछ खतरा उठाकर भी अपने-अपने घरों को लौट गये। उत्तरप्रदेश की अखिलेश सरकार ने भी उन्हें वापस जाने मे मदद की यहाँ तक कि वापस जाने वाले परिवारों को पाँच पाँच लाख तक की आर्थिक सहायता भी दी गई। फिर भी कुछ लोग कैम्पों मे रूके रह गये। यहाँ तक कि कुछ लोग तो पाँच लाख रूपया सहायता लेने के बाद भी वापस नही गये और कुछ लोग आज तक वापस जाने को तैयार नही है।
प्रारंम्भिक काल मे कैंम्पों मे पेशेवर सांम्प्रदायिक राष्ट्र विरोधी तत्वों का समावेश नही था। धीरे-धीरे इन कैंम्पों मे ऐसे तत्वों का समावेश होता गया तथा बचे हुए लोगों मे से अनेक ने इस घटना को एक व्यवसाय मानकर राज्य सरकार का अधिकतम शोषण करने का प्रयास शुरू किया। ऐसे तत्व एक ओर तो भय का नाटक करते थे, दूसरी ओर अधिक से अधिक करूणा के दृष्य दिखाने का भी नाटक करते थे। तीसरी ओर इनके एजेंट मीडिया के माध्यम से उत्तरप्रदेश सरकार या भारत सरकार पर भी ऐसा दबाव बनाते थे जैसे कि कैंम्प मे बचे लोगों को बहुत ही अमानवीय स्थिति मे रहना पड रहा है। अखिलेश सरकार ने बहुत हिम्मत करके ऐसे कैंम्पों को बन्द करने का प्रयास किया। इसका लाभ अन्य राजनैतिक दलों ने भी बहुत उठाया और अब भी कुछ लोग अपने कैंम्पों मे बचे हुए हैं। स्पष्ट दिखता है कि जो लोग वापस हुए है, उनसे किसी के साथ कोई दुर्घटना नही हुई है। फिर भी या तो ये लोग जाना नही चाहते हैं या पेशेवर राजनेता अपने राजनैतिक लाभ के लिए उन्हें रोककर रखना चाहतें हैं।
विस्थापन अथवा पलायन की ऐसी ही घटना कश्मीर मे भी हो चुकी है। वहाँ से भी बडी संख्या मे कश्मीरी पंडित पलायित होकर या तो जम्मू चले गये अथवा भारत के अन्य शहरों मे बस गये। कश्मीर मे भी लगभग वैसा ही हुआ, जब ऐसे विस्थापित कश्मीरी पंडितों मे से कुछ संख्या मे पंडित अपने घरों को चले गये और मुज्जप्फर नगर सरीखे ही कुछ लोग कैंम्पों मे रह गये। सरकार से सुविधाएं भी लेते रहे और अन्य सुविधाओं की माँग भी करते रहे। आज तक काफी संख्या मे कश्मीरी पंडित कश्मीर छोडकर अन्य जगहों पर रह रहें हैं और जिस तरह मुज्जप्फर नगर मे मुस्लिम सांम्प्रदायिक तत्व अर्थात बसपा-कॉंग्रेस तथा कुछ अन्य लोग जिनमें मीडिया कर्मी भी शामिल हैं, वहाँ की सरकार को बदनाम करने के लिए नमूने के तौर पर ऐसे लोगों को प्रतीक स्वरूप रखे हुए हैं। उसी तरह कश्मीर मे भी कश्मीर पंडितों को वापस जाने से रूकने को सांम्प्रदायिक हिन्दू विशेषकर संघ-भाजपा के लोग हथियार के तौर पर उपयोग कर रहें हैं।
फिर भी यदि गहराई से सोचा जाए तो ये दोनो समस्याएँ लगभग समान होने के बाद भी कुछ भिन्न हैं। मुज्जप्फर नगर मे जो पलायन हुआ उसका कारण सांम्प्रदायिक हिन्दुओं का मुसलमानों पर कोई अत्याचार नही था, बल्कि सांम्प्रदायिक मुसलमानों का बढा हुआ मनोबल था। क्योंकि वहाँ शक्ति प्रदर्शन की पहल सांम्प्रदायिक मुसलमानों ने ही की थी। यद्यपि इसका परिणाम वहाँ के शांति प्रिय मुसलमानों को झेलना पडा। दूसरी ओर कश्मीरी पंडितों का पलायन भी सांम्प्रदायिक मुसलमानों द्वारा अपने शक्ति प्रदर्शन के रूप मे तथा कश्मीर को हिन्दुओं से खाली कराने के उदेश्य से पैदा हुआ। दोनों के परिणाम भले ही एक समान हुए जिसमें शांति प्रिय हिन्दू और शांति प्रिय मुसलमानों को भोगना पडा, किन्तु दोनो घटनाओं के कारण सांम्प्रदायिक मुसलमान ही थे। यदयपि दोनो घटनाओं से लाभ सांम्प्रदायिक हिन्दुओं को ही हुआ। कश्मीरी पंडित चाहे जिस दशा मे रह रहें हों, जितने परेशान हों, किन्तु उनका लाभ सांम्प्रदायिक हिन्दू संगठनों को मिल रहा है। मुज्जप्फर नगर मे हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच राजनैतिक धु्रवीकरण हुआ और उसका लाभ अलग-अलग राजनैतिक दलों के लोग उठा-उठा कर प्रसन्न हो रहें हैं।
यदि गंभीरता से सोचा जाए तो स्वतंत्रता के बाद भारत मे लगातार सांम्प्रदायिकता का विस्तार हुआ है। इसकी शुरूवात स्वतंत्रता के शीघ्र बाद नेहरू और पटेल के बीच विचार भिन्नता के रूप मे देखना चाहिए। गांधी हत्या एक शुद्ध सांम्प्रदायिक घटना थी, जिसके पीछे हिन्दू-राष्ट्र की भावना काम कर रही थी। भले ही इस हत्या से संघ का कोई सीधा संबंध नही था, किन्तु इस भावना से संघ का निरंतर संबंध था और वह संबंध आज तक बना हुआ है। सरदार पटेल एक ईमानदार राष्ट्रवादी नेता थे, जो हिन्दुओं की ओर आंशिक रूप से झुके हुए थे। दूसरी ओर पंडित नेहरू एक समाजवादी विचारों के पोषक थे जो आंशिक रूप से मुसलमानों की ओर झुके हुए थे। भारत की राजनैतिक व्यवस्था मे इन दोनो के अतिरिक्त एक तीसरे व्यक्ति भीमराव अंम्बेडकर थे, जो भले ही जातीयता के आधार पर हिन्दुओं से घृणा करते हों, किन्तु सांम्प्रदायिक आधार पर वे हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच मे समान भाव रखते थे। सरदार पटेल और पंडित नेहरू के अलग-अलग अनेक उल्लेखनीय कार्य अब तक याद कियें जाते हैं, किन्तु सांम्प्रदायिकता के आधार पर दोनो ही एक समस्या के रूप मे थे और आज तक हैं। गांधी हत्या के बाद सच्चाई यह है कि हिन्दू सांम्प्रदायिकता को पूरी ताकत से कुचल देना चाहिए था। पटेल जी ने प्रारंभ मे तो लोक-लाज से ऐसा कदम उठाया भी किन्तु शीघ्र ही संघ परिवार द्वारा स्वयं को सांस्कृतिक गतिविधियों तक सीमित रखने का झूठा आश्वासन पाकर विश्वास कर लिया और उन्हें सब प्रकार की छूट दे दी। संघ परिवार कितना सांस्कृतिक सीमाओं मे हैं यह बात किसी से छिपी नही है। दूसरी ओर पंडित नेहरू ने सांम्प्रदायिक हिन्दुओं को कुचलने की अपेक्षा सांम्प्रदायिक-मुसलमानों को प्रोत्साहन दिया जिससे कि बैंलेंस बना रहे। सब जानतें हैं कि स्वतंत्रता के पहले जब भारत का विभाजननिश्चित नही हुआ था, उस समय विभाजन को टालने के लिए मुसलमानों को अल्पसंख्यक संरक्षण देने की बात कही गई थी। जब इस संरक्षण से संतुष्ट न होकर मुसलमानों ने पाकिस्तान ले लिया, भारत का विभाजन हो गया, इसके बाद भी अल्प-संख्यक शब्द संविधान से नही हटाया गया। यहाँ तक कि चापेकर बंधुओं ने संविधान बनाते समय यह प्रश्न उठाया भी तो पंडित नेहरू ने कडे होकर उनको रोक दिया। यदि उस समय हिन्दू-राष्ट्र और अल्प-संख्यक संरक्षण जैसे मुद्दों को हटाकर सरदार पटेल और पंडित नेहरू समान नागरिक संहिता के पक्ष मे हो गये होते तो भारत से सांम्प्रदायिकता का यह कोढ मिट गया होता। मुझे विश्वास है कि समान नागरिक संहिता के पक्ष मे भीमराव अंम्बेडकर भी मान जाते। गांधी हत्या के बाद हिन्दू सांम्प्रदायिकता के प्रति नरम रूख रखने वाले सरदार पटेल और उसकी भरपाई के लिए मुस्लिम सांम्प्रदायिकता को संरक्षण देने वाले पंडित नेहरू, कश्मीर या कश्मीरी पंडितों और मुज्जप्फर नगर दंगों में पलायन करने पाले शांति प्रिय मुसलमानों के कष्टों के लिए दोषी हैं।
पंडित नेहरू समाजवाद के पोषक थे, किन्तु आश्चर्य है कि वे कभी समाजवाद का अर्थ समझे ही नही। समाजवाद का अर्थ होता है समाज सशक्तिररण और जिसका धरातल पर अर्थ होता है परिवार, गांव , जिले को अधिकतम संवैधानिक अधिकार देना। पंडित नेहरू ने समाजवाद का अर्थ किया राष्ट्रीयकरण अर्थात राज्य सशक्तिकरण और जिसका धरातल पर अर्थ हुआ परिवार गाँव , जिले के सारे अधिकार छीनकर राज्य के पास केन्द्रित करना। दूसरी ओर सरदार पटेल ने भी राष्टवाद का अर्थ नही समझा। राष्टवाद का अर्थ होता है राष्ट की प्रभुसत्ता को समाज के साथ जोडना और समाज सशक्तिकरण । सरदार पटेल ने भी विकेन्द्रित सत्ता की जगह केन्द्रित सत्ता का समर्थन किया। आश्चर्य है कि दोनो के प्रशंसक अलग-अलग गुटों मे बॅंटकर दोनो के अलग-अलग गुणगान करने मे लगे रहतें हैं। जबकि दोनो की ही वास्तविकता कुछ अलग है।
अब भी सब कुछ विध्वंस नही हुआ है, अब भी सांम्प्रदायिकता का समाधान संभव है। यद्यदि वह समस्या अब उतनी साधारण नही है जैसी गांधी हत्या के तत्काल बाद थी किन्तु समस्या चाहे जितनी विकराल हो गई हो उसका समाधान तो करना ही होगा। अब शीघ्रातिशीघ्र दो काम करने चाहिए- राष्ट्र सर्वोच्च की जगह समाज सर्वोच्च का विचार बढाने की आवश्यकता है। दूसरी आवश्यकता है कि समान नागरिक संहिता को संविधान का भाग बनाकर उसे कडाई से लागू कर दिया जाए। राष्ट्र सर्वोच्च की जगह समाज सर्वोच्च की बात का सांम्प्रदायिक हिन्दू पुरजोर विरोध करेगें। दूसरी ओर समान नागरिक संहिता का सांम्प्रदायिक मुसलमान भी पुरजोर विरोध करेंगें और यदि दोनो बातों को एक साथ लागू कर दिया जाए तो सांम्प्रदायिक तत्व अलग-थलग पड जाएंगें। मुझे तो ऐसा भी लगता है कि ऐसा कदम उठाते ही सांम्प्रदायिक हिन्दू और सांम्प्रदायिक मुसलमान एक-जुट हो जाएंगें, एक ही थाली मे बैठकर खाना-खाने लगेगें, एक साथ होकर इन विचारों का विरोध करने लगेगें और संभव है कि सांम्प्रदायिकता का कलंक भारत से मिट जाए।

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