Thursday, 7 November 2013

ऐसा देश हो मेरा

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Friday, 24 May 2013

जनता के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष कर संग्रह से चलने वाला व्यवस्था न्यायपालिका ,कार्यपालिका और विधायिका जनता का मालिक कैसे हो सकता है ? जनता मालिक है ये हमारे वेतन भोगी नौकर व्यवस्थापक हैं I
मै भारत सरकार के तमाम मुलाजिमों ( न्यायपालिका ,कार्यपालिका और विधायिका) को जनता के तरफ से कहना चाहता हूँ अब अपने को गवर्नमेंट कहना छोड़ दो I मालिक पर कोई नौकर गोवर्ण/शासन कर हीं नहीं सकता I यह प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है I गवर्नमेंट शब्द को परिभाषित करो I अब अपने को मात्र व्यवस्थापक समझो I गवर्नमेंट तो जनता यानि लोकतंत्र की असली मालिक है I तुम हमारे वेतन भोगी नौकर व्यवस्थापक हो I
जनता के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष कर संग्रह से चलने वाला व्यवस्था न्यायपालिका ,कार्यपालिका और विधायिका जनता का मालिक कैसे हो सकता है ? जनता मालिक है ये हमारे वेतन भोगी नौकर व्यवस्थापक हैं I न्यायपालिका ,कार्यपालिका और विधायिका का तामझाम और अस्तित्व जनता के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष कर संग्रह से प्राप्त राजश्व से है I हमारी बिल्ली हीं हमहीं पर म्यायूं ? अब ये नहीं चलेगा I व्यवस्था परिवर्तन हीं अंतिम समाधान है I

संसद भारतीय लोक तंत्र का प्रतिक होनी चाहिए जो की नहीं हो सका

संसद भारतीय लोक तंत्र का प्रतिक होनी चाहिए जो की नहीं हो सका I हमने संसद को लोक नियंत्रित तंत्र के रूप में विकसित करने का स्वप्न देखते हुए संसदीय प्रणाली को आत्मसात किया I परन्तु षड़यंत्र के तहत हमारा देश तंत्र नियंत्रित हो गया I असली मालिक नौकर की भूमिका में और हमारा नौकर मालिक की भूमिका में आ बैठा है I आजादी के 67 वर्ष बीत गए I हमारा देश केन्द्रीयकृत संसदीय सत्ता का केंद्र बन गया I यह सब सत्ता लोलुप सत्ता पक्ष और सुविधा भोगी प्रतिपक्ष के षड़यंत्र के कारण हुआ है I हमारा मैनेजर (सत्ता पक्ष /सत्ताधरी पार्टी ) तो चोर बन हीं गया हमने चोरी को रोकने के लिए या रखवाली के लिए प्रतिपक्ष रुपी वाच डॉग यानि सजग कुत्ता जो संसद में बैठाया वो भी मांस के टुकडे और जूठन खाकर मालिक के साथ नमक हरामी कर बैठा I हमने अब सोंचा है हम अब अपने नौकर और पालतू कुत्ते के भरोसे अपनी संपत्ति को यू हीं नहीं छोड़ेंगे I हम अब सहभागी लोक तंत्र बनायेंगे और समाज नियंत्रित / लोक नियंत्रित शासन प्रणाली लागू करेंगे I आप यकीन कीजिये हम राज्य पर समाज की संप्रभुता स्थापित करने की तैयारी में जुटे हैं I भारत का प्रस्तावित संविधान और लोक संसद के मुद्दे पर लोक स्वराज्य मंच ने पुरे देश में व्यवस्था परिवर्तन अभियान के तहत भारत भ्रमण यात्रा के जरिये जन जागरण अभियान चलाया है I लोक स्वराज्य मंच से जुड़ने के लिए संपर्क करे I श्री बजरंग मुनि मोबाइल नंबर -09617079344 श्री सिद्धार्थ शर्मा मोबाइल नंबर - 09632149431 श्री रमेश कुमार चौबे मोबाइल नंबर - 08435023029 , श्री दीपक कुमार जायसवाल मोबाइल नंबर 09575566074
संसद और न्यायलय की अवमानना का मुक़दमा जनता पर चलाना किसी भी हालत में किसी भी तरह से न्याय संगत हो हीं नहीं सकता है I अवमानना शब्द को शाब्दिक रूप से परिभाषित करने की जरुरत है I हमारे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता , जो हमें नैसर्गिक रूप से मिले हैं ,संविधान कौन होता है उस पर अंकुश लगाने वाला ? मौलिक अधिकार इश्वर प्रदत्त होता है I संविधान कौन होता है यह देने वाला ? प्रकृति ने हमें जो जन्म से दिया है उसे अपना खैरात कहने वाला संविधान हीं अपने आप में गलत और दोष पूर्ण है I
आप सभी स्नेहिल मित्रो को सादर धन्यवाद I आप हमारे व्यक्त विचारों पर हमेशा प्रतिक्रिया देते हैं या हमारे पोस्ट्स को लाइक करके हमारा उत्साह वर्धन करते हैं I हम आपके स्नेह , सुझाव और आशीर्वाद की बदौलत हीं अपना मनतब्य आपके प्रतिक्रिया के लिए आपके समक्ष रख पाते है I उम्मीद हीं नहीं हमें पूर्ण विश्वास है आप सभी मित्रों का स्नेह , सुझाव और आशीर्वाद हमें निरंतर प्राप्त होते रहेगा I मुझसे कोई भूल या गलती हो आप हमें अपना सकारात्मक प्रतिक्रिया देंगें I या मुझे मेरे मोबाइल नंबर 08435023029 पर फोन करके मुझे आपना स्नेह , सुझाव और आशीर्वाद का अमृत पान करा सकतें हैं I सादर धन्यवाद ...............रमेश कुमार चौबे

सिंहासन त्यागो, भागो, इतिहास बदलने वाला है !!

सिंहासन त्यागो, भागो, इतिहास बदलने वाला है !!

पूर्ण हुआ विश्राम, सिंह अँगड़ाई लेनेवाला है !
सिंहासन त्यागो, भागो, इतिहास बदलने वाला है !
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समय नहीं अनुकूल पापियों का हरदम रहता है !
करनी का फल आज नहीं तो कल सबको मिलता है !
बोया जो विष-बीज, पल्लवित-पुष्पित होनेवाला है !
सिंहासन त्यागो, भागो, इतिहास बदलने वाला है !
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दरक रही हैं चट्टानें, पर्वत में पड़ी दरारें !
आसमान से बूँद नहीं, अब बरसेंगे अंगारे !
जनमेजय का नाग-यज्ञ, दिल्ली में होनेवाला है !
सिंहासन त्यागो, भागो, इतिहास बदलने वाला है !
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माता का तन नोंच-नोंच हँस-हँस भक्षण करते हो !
भारत का सर्वस्व विदेशों में गिरवी रखते हो !
तेरा पातक वज्र सदृश, तेरे सिर गिरनेवाला है !
सिंहासन त्यागो, भागो, इतिहास बदलने वाला है !
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अरे कौरवों के वंशज, दुर्योधन के भ्राताओं !
युद्ध अवश्यम्भावी है, रोको अथवा पछताओ !
एक महाभारत फिर से भारत में होनेवाला है !
सिंहासन त्यागो, भागो, इतिहास बदलने वाला है !
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जनता को बलहीन समझ क्यों अनाचार करते हो !
पागल हो, अंगारों पर क्यों पग अपना धरते हो !
दूर हटो, जन-ज्वालमुखी विस्फोटित होनेवाला है !
सिंहासन त्यागो, भागो, इतिहास बदलने वाला है !
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चेहरा घृणित, मुखौटा मोहक, कलई खुलनेवाली है !
गुब्बारे में हवा भरा है, भीतर खाली-खाली है !
रूप भयानक तेरा सबके सम्मुख आनेवाला है !
सिंहासन त्यागो, भागो, इतिहास बदलने वाला है !
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नर-नारी, आबाल-वृद्ध, मुट्ठी भींचें ललकारे !
शत-सहस्त्र “अन्ना” दिल्ली में, मारेंगे हुंकारें !
धीर हिमालय पिघल-पिघल, अंगार उगलनेवाला है !
सिंहासन त्यागो, भागो, इतिहास बदलने वाला है !
मौन रहना आदत में नहीं है,प्रतिवाद करना स्वभाव है,अस्तित्व के लिए संघर्ष जीवन का शाश्वत सत्य है

अपने पालतू कुत्तो पर लगाम लगाये देश की जनता यानि जनतंत्र की असली और वास्तविक मालिक

अपने पालतू कुत्तो पर लगाम लगाये देश की जनता यानि जनतंत्र की असली और वास्तविक मालिक I जब कोई पालतू कुत्ता मालिक के साथ नमक हरामी करने लगता है तो मालिक का यह नैतिक कर्तब्य बन जाता है कि या तो वह अपने कुत्ते को खाना देना बंद कर दे या उसे डंडा मार करके उसे सुधरने का मौका दे I जनतंत्र में न्यायपालिका ,कार्यपालिका और विधायिका जनता के पालतू कुत्ते हीं हैं I हमारे प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष कर संग्रह से वेतन और सुविधा पर पलने वाले हमारे मालिक कैसे हो सकतें हैं ? जनता के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष कर संग्रह से चलने वाली व्यवस्था, न्यायपालिका ,कार्यपालिका और विधायिका जनता की मालिक कैसे हो सकती है ? 
जनता मालिक है ये हमारे वेतन भोगी नौकर व्यवस्थापक हैं I

न्यायपालिका ,कार्यपालिका और विधायिका जनता की मालिक कैसे हो सकती है ?

जनता के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष कर संग्रह से चलने बाली व्यवस्था, न्यायपालिका ,कार्यपालिका और विधायिका जनता की मालिक कैसे हो सकती है ?
जनता मालिक है ये हमारे वेतन भोगी नौकर व्यवस्थापक हैं I
लेकिन आजादी के समय ही नेताओ ने सड़यंत्र करके इस देश की जनता को आजाद नहीं होने दिया, उलटे सत्ता का हस्तांतरण मान कर अंग्रेजो की तरह ही शासन ब्यबस्था को जारी रखके, अपनी और अपनी नाकारा संतानों तथा अपने चमचो को सत्ता से हिटलारसाही चलाने और देश लूटकर भी सुरक्छित रहने को, कानून और पुलिस को अपंग बनाकर सत्ताधारी की सुरक्छा और जनता का दमन करने बाला अंग्रेजी कानून जारी रखा I
जनता इन गद्दारों को हरा भी दे तो भी ये जनबिरोधी काले अंग्रेज राज्यसभा और बिधान परिषद् तथा 6 माह तक मनोनयन से मंत्री और लाल बत्ती लेकर देश की जनता का धन लूट सकते हें I
जाँच प्रक्रिया और कानून पर भरोषा के नाम पर आजीवन सुरक्छित रह सकते हें, सत्ता पर आकर मुक्क्दमे वापस लेने की भी सुबिधा I
कर्मचारी 60 -65 की उम्र में रिटायर्ड इनको देश लूटने और जनता के टेक्स के धन से अय्याशी की
सुबिधा आजीवन चाहे शरीर, आंखे और बुददी काम करना बंद कर चुके हो I
देश की जनता को लूटने के लिए इनको अकल,शकल,उम्र,योग्यता,किसी चीज की बाध्यता नहीं ?
जागो और जगावो देश को गद्दार नेताओं की चंगुल से बचाओं
आज कोई न नारा होगा सिर्फ देश बचाना होगा नेता मारो देश बचावो यह अभियान चलाना होगा I देश के इन लुटेरों को फिर से सबक सिखाना होगा I जनता मालिक और सब नौकर ये आत्म बोध उन्हें करना होगा I
संविधान है धोखा यारों,राजनेता हैं तवायफ ,संसद हो गई है सब्जी मण्डी और न्यायपालिका बन गई भ्रष्टाचारी I देश का बुरा हाल है यारों, जागो और जगायो यारों सबको यह बतलायो I
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Sunday, 19 May 2013


कांग्रेस में राहुल, सपा में अखिलेश, आरजेडी में तेजस्वी, शिवसेना में उद्धाव-आदित्य, डीएमके में स्टालिन-कनीमोझी, एनसीपी में अजित पवार-सुप्रिया सुले, जेडीएस में कुमारस्वामी....। बाकी पार्टियों में भी कमोबेश यही हाल। तो क्या परिवारवा ने राजनीतिक दलों को पुश्तैनी जागीर बना दिया है? राय दें।

झारखंडी/छत्तीसगढ़ी गरीबों का किशमिश – महुआ


झारखंडी/छत्तीसगढ़ी गरीबों का किशमिश – महुआ महुआ का झारखंड से बहुत ही गहरा संबंध रहा है. गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर अपने गिरिडीह प्रवास के दौरान जिस घर में रहते थे, उस घर पर रहते हुए उन्होंने महुआ नाम की एक कविता भी लिखी थी जहां वर्तमान में महिला काॅलेज चल रहा है. गुरूदेव टैगोर ने साहित्य में तो महुआ को स्थान दिला दिया परंतु बहुताय में पाया जाने वाला महुआ का झारखंड़ में वो स्थान प्राप्त नहीं हुआ जबकि आदिवासी और दलित बहुल राज्य झारखंड़ के ग्रामीण इलाकों में कई महीने चुल्हा महुआ बेच कर भी जलता है. चिंताजनक बात यह है कि राज्य में महुआ के फल से गैरकानूनी ढ़ंग से शराब बनाने का धंधा ग्रामीण इलाकों में घर-घर में पाया जाता है जिससे ग्रामीणों का दाल-रोटी की व्यवस्था तो हो जाती है परंतु वैसे घरों के किशोर व युवकों का भविष्य खतरे में पड़ गया है. कम उम्र से ही महुआ के शराब की लत नवयुवकों को लग जाती है जो नशे की अवस्था में कई अन्य अपराधिक प्रवृतियों को जन्म देती है. महुआ की पैदावार ज्यादा होने के कारण ग्रामीणों द्वारा इसे पड़ोसी राज्यों यथा ओडि़शा, छतीसगढ़ और पश्चिम बंगाल को औनेपौने दाम में बेच दिया जाता है. महाराष्द्र सरकार के लिए जो महत्व अंगूर का है, गोवा सरकार के लिए जो महत्व काजू का है वहीं महत्व झारखंड़ सरकार के लिए महुआ का हो सकता है परंतु महुआ आधारित शराब उद्योग झारखंड़ में नहीं है जबकि महाराष्द्र सरकार अंगूर से शराब बनाने का तथा गोवा में काजू से फेनी नामक शराब बनाने का वकायदा उद्योग है जिससे संबंधित सरकारों को राजस्व की प्राप्ति होती है. झारखंड़ सरकार को भी महुआ आधारित शराब उद्योग लगाने की दिशा की ओर पहल करना चाहिए जिससे राज्य के ग्रामीण इलाकों में आज घर-घर में शराब बनाने का धंधा चल रहा है वो बंद हो सके और ग्रामीण युवकों को शराब के नशे से बाहर निकाला जा सके, इसके अतिरिक्त सरकार को राजस्व की प्राप्ति होगी सो अलग. उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों के जमाने में ब्रिटिश सरकार के मदद से राय बहादुर ठाकुर दास ने महुआ के फल और फूल के जांच के बाद इससे शराब बनाने का पहला डिस्टेलेरी रांची में सन् 1875 ई. में रांची डिस्टेलेरी के नाम से लगाया था. रांची डिस्टेलेरी के सभी मशीन और उसके कल-पूर्जे स्काटलैंड, बरबिंघम और मैनचेस्टर से मंगावाये गये थे. वर्तमान में रांची डिस्टेलेरी में महुआ से शराब नहीं बनाया जाता क्योंकि यह गैरकानूनी करार दिया गया है. महुआ से बेहतरीन शराब बनायी जा सकती है अगर इसे सही ढ़ंग से डिस्टेलेरी में बनाया जाए परंतु ऐसा नहीं होने के कारण राज्य के ग्रामीण इलाकों में चोरी-छिपे घरों में यूरिया, नौशादर और कई सस्ते रसायनों को मिलाकर जानलेवा शराब या ‘हूच’ बनाया जाता है तथा जिसके सेवन से कई बार ग्रामीण मौत के शिकार तक हो जाते है. प्रसिद्ध जीव वैज्ञानिक चाल्र्स डार्विन के वंशज फेलिक्स पैडल, जो मानवशास्त्री और इंस्टीच्यिूट आॅफ रूरल मैनेजमेंट, आनंद के विजिटिंग प्रोफेसर है, अपने झारखंड़ प्रवास के दौरान महुआ के स्वाद को चखने के बाद आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि राज्य सरकार क्यों नहीं महुआ आधारित उद्योग को अब तक विकसित किया और उन्होंने यह भी कहा था कि भारतीय क्यों फ्रेंच और इंग्लिश स्कोच लेते है जबकि उनके पास महुआ जैसे बेहतरीन फल मौजूद है. झारखंड़ में प्राय सभी 24 जिलों में महुआ ही एकमात्र फल है जो बहुताय में पाया जाता है. वनों में निवास करने वाले आदिवासी व गैर आदिवासी परिवार चैत-वैशाख महीने में महुआ के फल को चुन-चुन कर इकटठा करते है और गांव के सप्ताहिक हाट में पड़ोसी राज्य यथा ओडि़शा, छतीसगढ़, पश्चिम बंगाल से आए व्यापारियों द्वारा निर्धारित मूल्यों पर बेचने के लिए मजबूर देखे जा सकते है. गिरिडीह के ग्रामीण इलाकों में फलची-परदहा गांव निवासी धनेश्वर तूरी कहते है कि जब वो छोटे थे तो उनका परिवार महुआ चून कर अच्छे मूल्य पर बेच देता था और उनका पूरा परिवार खूशी-खूशी सिर्फ महुआ चून कर सालभर खा लेता था परंतु आजकल तो पूरे महीने महुआ चुनकर और उसे बेचकर एक महीने का भी राशन जुटाना मुश्किल है. नाम नहीं बताने के शर्त पर चतरो गांव के निवासी ने बताया कि महुआ के फलों को चुनने के लिए उसका पांच सदस्यों का परिवार सूबह चार बजे से दस बजे दिन तक लगा रहता है, चालीस-पचास किलो महुआ चुनने के बाद उसे धोना पड़ता है फिर सूखाना पड़ता है तब हाट ले जाया जाता है जहां तीस रूपए मन से ज्यादा नहीं मिल पाता है इसलिए घर पर ही शराब बनाने लगे और बेचने लगे. पुलिस जब आती है तो एक-दो बोतल दारू और एक-डेढ़ सौ रूपया दे दिया करता हॅंूं. इस तरह गुजारा हो जाता है. गांवों में दलित, आदिवासियों के ऐसे कितने ही घर है जो गैरकानूनी ढ़ंग से महुआ का शराब बनाते है. गिरिडीह जिला अंतगर्त मंझलाडीह गांव के प्राय सभी आदिवासी घरों में महुआ से शराब बनाने की परम्परा चली आ रही है. शराब बनाने के बाद उसे बीयर के बोतलों में भरकर थैली में लेकर दूर-दूर तक लोग बेचने चले जाते है. दूर-दराज गांवों में समृद्ध परिवार वाले जैसे रोज दूध लेते है उसी तरह महुआ का शराब भी रोज लेते है. राज्य सरकार को गंभीरता से इस ओर ध्यान देना होगा कि झारखंड़ के गांवों में घर-घर में देशी डिस्टेलेरी होने से वैसे लाखों परिवारों का भविष्य क्या होगा जो शराब बनाते है जिसे ग्रामीण चुआना कहते है, तथा जिसमें बच्चे और महिलाएं भी शमिल रहते हैं.
शिकवा रहे,कोई गिला रहे हमसे,
आरजु यही एक सिलसिला रहे हमसे।
फ़ासलें हों,दूरियां हो,खता हो कोई, 
दुआ है बस नजदीकियां रहें हमसे॥
मित्रो आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।

मर्म जानो, धर्म तो समझो बाज़ार का

मर्म जानो, धर्म तो समझो बाज़ार का


यह सच है कि इंसान और समाज, दोनों ही लगातार पूर्णता की तरफ बढ़ते हैं। लेकिन जिस तरह कोई भी इंसान पूर्ण नहीं होता, उसी तरह सामाजिक व्यवस्थाएं भी पूर्ण नहीं होतीं। लोकतंत्र भी पूर्ण नहीं है। मगर अभी तक उससे बेहतर कोई दूसरी व्यवस्था भी नहीं है। यह भी सर्वमान्य सच है कि लोकतंत्र और बाजार में अभिन्न रिश्ता है। लोकतंत्र की तरह बाजार का पूर्ण होना भी महज परिकल्पना है, हकीकत नहीं। लेकिन बाजार से बेहतर कोई दूसरी प्रणाली नहीं। कितनी अजीब विडम्बना है कि व्यापक सामाजिक हितों की बात करनेवाले समाजवादी व साम्यवादी लोग व्यक्ति के ऊपर समाज को तरजीह देनेवाली इन दोनों ही व्यवस्थाओं को खारिज कर देते हैं। वे लोकतंत्र के बजाय पार्टी या सरकार की ताकत और आर्थिक सक्रियता को वरीयता देते हैं। इतने कटु अनुभवों के बावजूद वे यह देखने को तैयार नहीं कि एक पार्टी या सरकार का वर्चस्व कैसे व्यापक अवाम और राष्ट्र के हितों के खिलाफ चला जाता है।

इतना तय है कि सृजन और उद्यमशीलता का विकास उसी समाज में हो सकता है जहां भरपूर लोकतंत्र हो और बाजार शक्तियों को मुक्त भाव से खुलकर खेलने की आज़ादी हो। सब कुछ खुला हो। सबके सामने हो। पूरी पारदर्शिता हो। नियम सबके लिए समान हों। असमान होड़ न हो। धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में युद्ध तो चले, लेकिन तय नियमों के अंतर्गत। निहत्थे पर वार न हो, सूरज ढलते ही युद्ध बंद हो जाए। आदि-इत्यादि। प्रतिस्पर्धा पर टिका बाजार भी ऐसे ही काम करता है। यह सच है कि महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण के रहते हुए भी, बल्कि उनके रहने के कारण ही, युद्ध-धर्म बार-बार तोड़ा गया क्योंकि आज की तरह तब भी, जीत ही सबसे बड़ा धर्म था। उसी तरह बाज़ार में भी तमाम कारस्तानियां चलती हैं। लेकिन कोई शासक जब एक इंच जमीन भी देने से इनकार कर दे, तब युद्ध ही एकमात्र विकल्प रह जाता है।

अपने यहां भी मुक्त बाजार और स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा का कोई विकल्प नहीं है। प्राकृतिक संसाधनों के वितरण में सरकार के सारे विशेषाधिकार छीन लिये जाने चाहिए। तभी राजनेताओं, नौकरशाहों और राजकृपा पर फलते-फूलते दलालों व धंधेबाज़ों की दुरुभिसंधि टूटेगी। तभी प्रतिभा और उद्यशीलता का विकास होगा। बाजार की शक्तियां उन्मुक्त विकास करेंगी और तमाम गोरखधंधों पर अपने-आप ही लगाम लग जाएगी। फाइनेंस के विद्यार्थी जानते होंगे कि पोर्टफोलियो में 40 से ज्यादा कंपनियों के शेयर हों तो अलग-अलग कंपनी से जुड़ा खास जोखिम आपस में कटकर खत्म हो जाता है और पोर्टफोलियो का जोखिम बाजार के समान जोखिम जितना रह जाता है। इसी तरह मुक्त बाज़ार तमाम छोटी-मोटी गड़बड़ियों को सामूहिक असर से खत्म कर देता है। वहीं, सरकार के नियंत्रण में चलनेवाला ‘बाज़ार’ कितनी बुराइयों और भ्रष्टाचार को जन्म देता है, इसके लिए आज किसी प्रमाण की जरूरत नहीं रह गई है।

आज हर तरफ आर्थिक विकास का शोर है। लेकिन हर सार्थक आर्थिक विकास में जन भागीदारी की जरूरत है। दूसरे, कोई भी आर्थिक विकास श्रम, पूंजी और टेक्नोलॉजी जैसे उत्पादन के कारकों से ही नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवस्थाओं से भी तय होता है। जिस देश में आमजन पर डंडे बरसाने के लिए सरकार अब भी औपनिवेशिक शासन के दौरान 1860 में बनी भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) का सहारा लेती हो, उसका विकास जन भागीदारी कैसे करवा सकता है? आज बाज़ार शक्तियां पुराने तंत्र से टकरा रही हैं और इसी का असर है कि केजरीवाल, नारायण मूर्ति, किरण कार्णिक जैसी शख्सियतें उभर रही हैं और देश की आईटी राजधानी बैंगलोर के उद्योगपति पॉलिटिकल एक्शन कमिटी बना डालते हैं। कुछ विचारक मानते हैं कि भारत इस वक्त लोकतांत्रिक पूंजीवाद के रास्ते पर चल पड़ा है।

देश में हर तरफ से सार्वजनिक जीवन में शुचिता और पारदर्शिता की मांग उठ रही है। सूचना अधिकार कानून का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। इससे और कुछ हो या न हो, अवसरों व सूचनाओं की समानता बढ़ेगी। जो भी गड़बड़ी हो, सबसे सामने आ जाएगी। कायदे कानून ऐसे होने चाहिए कि हर किसी को कड़वा से कड़वा सच सामने लाने को मजबूर होना पड़े। तभी बाजार की शक्तियां काम करती हैं और अंततः संत स्वभाव अपनाकर वे शक्तियां ‘सार-सार को गहि रहै, थोथा देय उड़ाय’ का काम करती हैं। सोचिए, वॉलमार्ट भारत में मंत्री से लेकर संत्री तक को घूस खिलाकर अपने आने का रास्ता साफ करवा लेती है। लेकिन अमेरिका में उसे खुलासा करना पड़ता है कि उसने भारत में लॉबीइंग करने पर पिछले चार सालों में ढाई करोड़ डॉलर (125 करोड़ रुपए) खर्च किए हैं। भारत में अगर सच्चा लोकतंत्र और मुक्त बाजार होता तो यहां भी बताना जरूरी होता कि हमारे वाणिज्य व उद्योग मंत्री आनंद शर्मा हर अमेरिकी दौरे से लौटने के बाद मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई की वकालत क्यों करने लग जाते थे।

यह है बाजार की ताकत और उसकी सीमा भी। जिस देश में बाजार जितना मजबूत व स्वस्थ होगा, बाजार शक्तियां जितनी मुक्त होंगी, उस देश का लोकतंत्र भी उतना ही मजबूत व स्वस्थ होगा। जो लोग गरीबी हटाने के लिए सरकार की भूमिका को अपरिहार्य मानते हैं, वे भेड़ की रखवाली भेड़िए से कराने जैसा काम कर रहे हैं। अभी तक सरकार की इस कृपा से देश में अटक से कटक तक दलालों की बड़ी फौज खड़ी हो गई है। असल में बाजार की मूलभूत भूमिका यह है कि वह आर्थिक विकास से हासिल समृद्धि को, व्यापक सामाजिक संसाधनों को बांटने का काम करे। सरकारी दखल लोगों को पराश्रयी बनाता है, जबकि जरूरत उन्हें स्वावलंबी बनाने की है। बाजार अंततः लोकतंत्र की सेवा करता है। अगर वह लोकतंत्र की सेवा नहीं कर रहा, समाज से गरीबी को मिटाने में सहायक नहीं हो रहा तो यकीन मानिए कि उसके साथ जरूर कोई न कोई समस्या है। एक बात और। दुनिया में इंसानों द्वारा बनाई गई हर महान चीज को दुरुपयोग हुआ है। यकीनन, बाजार का भी दुरुपयोग हुआ है। लेकिन इसमें दोष उसका नहीं, बल्कि गलत राजनीति का है। सरकार और उसके तंत्र का है, उससे बाहर के लोगों का नहीं।
मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं कि मैंने यह मंज़िल क्यों चुनी। मलाल है तो बस इतना कि मंजिल तक पहुंचने का रास्ता अभी तक धुंधला है।
काम ऐसे करो जैसे कि तुम्हें धन चाहिए ही नहीं। प्यार ऐसे करो जैसे कि तुम्हें कभी चोट ही नहीं लगती। और, नाचो ऐसे जैसे कि तुम्हें कोई देख ही नहीं रहा।

कोल माफिया से लुटता छत्तीसगढ़

कोल माफिया से लुटता छत्तीसगढ़

बड़े-बड़े सफेदपोश शामिल हैं छत्तीसगढ़ की कोल ब्लाक को लूटने में I छत्तीसगढ़ के संसाधनों पर डाका डालने वाले माफिया लम्बे समय से कोयले पर भी लूट मचाए हैं इस बात की जानकारी लगातार सामने आ रही है। चिन्ताजनक यह है कि प्रभावी एवं अन्दर तक पहँुच रखने वाले सफेदपोश भी कोयले में हाथ काला किए बैठे हैं। बताते हैं कि चूंकि सत्ता के गलियारे में उनकी तुती बोलती है, इसलिए चाहकर भी प्रशासन चूँ तक नहीं कर सकता। हद तो यह होती है कि कोल माफिया से जुड़े लोग नेता बन गए हैं जो रात के अन्धेर में कोयला पार करने की गणित सेट करते हैं और दिन के उजाले में चकाचक कुर्ता-पायजामा पहन उस पर गर्म जैकेट डाल राजनीति झड़ते हैं। कहते हैं कि शासन प्रशासन पर उनका रौब दाव चलता है। यदि नजर दौड़ाएँ तो बिलासपुर से लेकर रायगढ़, नेला जांजगीर,कोरण आदि का इलाका कोयले से समृद्ध हैं। वहाँ के लोग बताते हैं कि यहाँ की धरती को थोड़ा खोदो तो कोयला दिखने लगता है। इस क्षेत्र में कोल की खानें हैं। इस इलाके की धरती के नीचे कोयले को देखकर उद्योगपति आकृष्ट हुए है। रायगढ़ से लेकर उस क्षेत्र में ही प्लांट धड़ाधड़ लग रहे हैं। इन प्लान्ट्स के संचालन में कोल का ही अह्म रोल होता है। चूँकि आस-पास की धरती कोयले से भरी है सो कोल आपूर्ति में दिक्कत नहीं आती। इसी का फायदा यहाँ उद्योग लगाने वाले संस्थान उठाते हैं। वे बाकायदा टीम बनाकर के खानों से कोयला उत्खनन कर निकालते हैं। इसके लिए किसी प्रकार का सरकारी परमिशन नहीं होता। कहते हैं कि सेटिंग करके बड़े पैमाने पर कोयला चोरी की जाती है। बिना अनुज्ञप्ति एवं सरकार की अनुमति के कोल खपने से कई नुकशान हो रहे हैं। सबसे पहले तो राज्य शासन के राजस्व को बड़ी आर्थिक क्षति हो रही है, दूसरे छत्तीसगढ़ की धरती की कोल सम्पदा लूट रही है, तीसरे माफिया फैलकर क्षेत्र को अशान्त कर रहे हैं और सबसे बड़ी बात यह कि प्रशासन के अधिकारी पंगु बन गए हैं जो किसी भी लिहाज से उचित नहीं है। शासकीय अधिकारी कहते हैं कि किसी बेचारे से कम नहीं हैं वे गाड़ी-बंगला चाहे बना लें किन्तु उनका ईमान उन्हें भीतर-ही-भीतर तोड़ता होगा। कोई भी सोचता है कि रायगढ़ नैला-जांजगीर,कोरबा आदि क्षेत्रों में इनते व्यापक पैमाने पर उद्योग क्यों लग रहे हैं लेकिन वे नहीं जानते कि यह क्षेत्र कोल की दृष्टि से समृद्ध है इसलिए इस क्षेत्र में उद्योग स्थापित हो रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि छत्तीसगढ़ के इन इलाके से कोल सम्पदा लूटी जा रही है और हम हैं कि चूप? आखिर कब तक हमारे प्रदेश में यह लूटमार मची रहेगी? अभी कुछ ही दिनों पूर्व रायगढ़ क्षेत्र में बिना ट्रांजिट पास के किसी उद्योग में कोल आपूर्ति का एक बड़ा माकला सामने आया। एसडीएम की अगुबाई में खनिज विभाग वालों ने जामगाँव के उद्योग में जांच की तो एक नहीं नौ ट्रक कोयला पकड़ा गया जो बिना किसी कागजात का था। खनिज टॉयल्टी चोरी के इस बड़े मामले में कई खुलासे हुए। वहाँ कलेक्टर अमित कटारिया बताते हुए इन सब मामलों में बेहद सख्त हो गए थे। इसी प्रकार से रायगढ़ क्षेत्र में ही 3 बजे रात में पुलिस टीम ने चोड़ीगुड़ा के पास टे्रक्टर में कोल चोरी करते लोगों को पकड़ा। पुलिस को देखकर चोर भाग खड़े हुए। बताते है कि कोल माफिया का नेटवर्क तगड़ा एवं फैला हुआ है। इस काम में बाहर से बुलाकर दबंग किस्म के लोगों को लगाया गया है। कोल प्वाइंट बनाकर तश्करी की जा रही है। चूँकि यह काम पूरी चैन बनाकर की जाती हैं इसलिए बहुत जल्दी कार्यवाही नहीं हो पाती। व्यूह रचना करके कोयला निकाला जाता है। इस मामले में चिन्तनीय है कि सैकड़ो ट्रक्स,टे्रक्टर एवं अन्य वाहन कोल के अवैध परिवहन में वेधड़क लगे हुए हैं फिर भी उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाता। आखिर कब तक दिखावे की कार्यवाही की जाती रहेगी? जानकार सूत्रों के मुताबिक कोल माफिया के तार भिलाई-दुर्ग एवं राजनांदगांव से भी जुड़े हैं, जो जानकारी मिली हे उससे चौकांने वाली बात यह है कि राजधानी रायपुर में कोल माफिया के सूत्रधार रहता है जो सत्ताधीशों एवं राजनीतिज्ञों के साथ उच्च प्रशासनिक हल्कों में गोटी सेट रखता है। कोल तस्करी के काम बताते हैं कि कोल माइन्स से जुड़े लोग की मदद करते हैं। यहाँ तक जानकारी मिली है कि दिल्ली से लेकर हरियाणा तक रकम बँटती है। कोल ब्लॉकों तक से जो माल निकलता है उस तक में गड़बड़ी की शिकायतें हैं। 

रमन राज में धन-धरती की अफरा-तफरी का कीर्तिमान

 रमन राज में धन-धरती की अफरा-तफरी का कीर्तिमान छत्तीसगढ़ में डॉ रमण सिंह के राज में धन-धरती की लूटखसोट की नीति छत्तीसगढ़ के भविष्य के लिए घातक है I गत नौ वर्षों के भाजपा शासित रमन सरकार में भ्रष्ट कर्मियों एवं लालची मंत्रियों ने धन-धरती की अफरातफरी में एक अनूठा कीर्तिमान स्थापित किया है। किसी भी भ्रष्ट को किसी तरह का कोई भय पकड़े जाने का नहीं है। धड़ल्ले से घपले घोटालों को अंजाम दिया जा रहा है। रमन सरकार में कोई भी सौदा बिना कमीशन लिए नहीं होता है। प्रदेश के हर क्षेत्र में लूट खसोट का बाजार गरम है। छत्तीसगढ़ की जनता के हक की दौलत को सरकार द्वारा लुटाया जा रहा है I प्रदेश की बची खुची साख व सम्पदा को यदि बचाना है तो रमन सरकार को उखाड़ फेंकना आवश्यक है।
नम्बर दो की काली कमाई का यह आलम है कि उसे कहां खर्च करें, उसकी समस्या भ्रष्टाचारियों के समक्ष उत्पन्न हो जाती है और यह काला धन का ही कमाल है कि बाहर से अय्याशी की प्यास बुझाने कालगर्ल्स लाखों रूपये खर्च कर बुलाई जाती है। यह सब अफरात काला धन का कमाल है जो रमन राज में आसानी से उपलब्ध होता है। इस लत के शिकार अय्याश अकसर पकड़े जाने के भय से विदेशों में जाकर अपना शौक पूरा करते हैं ताकि प्रदेशवासियों की नजरों में साफ सुथरे बने रह सके। पहले के शासन में जिस्मफरोशी के धंधेबाजों में प्रशासन एवं पुलिस का भय था जो आज नजर नहीं आता है तथा अपराधों में बढ़ोतरी वर्तमान सरकार की लचर कानून व्यवस्था की देन है। प्रदेश के मुख्यमंत्री को बिगड़ती कानून व्यवस्था की कोई चिन्ता नहीं है क्योंकि मुख्यमंत्री जी को आसन्न चुनाव में सत्ता जाने का पूर्वाभास हो चुका है। उन्होंने इसीलिए सभी भाजपा कार्यकर्ता, नेताओं तथा मंत्रियों को खुलमखुला फर्रूखाबादी खेल खेलने की छूट दे रखी है।
सीबीआई, आर्थिक अन्वेषण ब्यूरो जैसी जांच एजेन्सियों द्वारा छापामारी में सब इंजीनियर से लेकर उच्च अधिकारियों के घरों से करोड़ों की चल-अचल संपत्ति के प्रकरण उजागर हो रहे हैं। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि जब भ्रष्ट कर्मचारियों के पास करोड़ों की सम्पत्ति है तो रमन सरकार के भ्रष्ट मंत्रियों के पास अरबों रूपये की अघोषित सम्पत्ति एवं काला धन होना लाजमी है। रमन सरकार ने सत्ता को व्यापार का स्वरूप दे दिया है तथा सत्ताधारियों पर केवल स्वार्थ का भूत सवार है। प्रदेश की जनता की दयनीय हालत की उसे जरा भी चिंता नहीं है परन्तु खेद एवं आश्चर्य का विषय है कि रमन सरकार में कर्मचारियों के घरों पर तो छापे पड़ते हैं परन्तु किसी मंत्री या धनाढय भाजपाई नेता के घर पर छापे क्यों नहीं पड़ते? जब भ्रष्ट कर्मचारी करोड़पति हैं तो भ्रष्ट मंत्री का अरबपति होना तय है। यह है रमन सरकार के भ्रष्टाचार का खुलासा जो सत्ता के दुरूपयोग की पराकाष्ठा है।

“अंधेर नगरी चौपट राजा"

" अंधेर नगरी चौपट राजा "
अगर हम देश में वर्तमान हालातों से खुश हैं,तो समझ जाइये हम इनसे बदतर हालातों को न्योता दे रहे हैं।।एक औसत दर्जे की बुद्धि का व्यक्ति इस वक़्त देश में चल रही घोर उथलपुथल से व्यथित होगा।।न कोई राजनैतिक स्थिरता,न कोई लोकतंत्र का सम्मान,सब प्राक्रतिक आपदा से भी ज्यादा विनाशकारी है।.पर प्राकृतिक आपदाएं मनुष्य के नियंत्रण से बाहर होती हैं,और देश में चल रही कृत्रिम और मानव रुपी समस्याओं का समाधान हमारे अपने हाथ में है।।इस देश का भाग्य शुरू से ही खोटा रहा है।।ब्रिटिश हुकूमत के आने से पहले अंदरूनी बिखराव इस कदर था,कि इसी ने बाहरी ताकतों को अन्दर प्रवेश करने का खुला नियंत्रण दिया।लोग आये,हमे लूट खसोट कर चले गए।।बहुत पीड़ा सही देश ने।।देश की प्राक्रतिक,राजनैतिक,आर्थिक,सांस्कृतिक अस्मत को चीर दिया गया।।पर हम उस पीड़ा को महसूस तो करते रहे,सहते भी रहे,लेकिन उसका कैसे इलाज़ किया जाए ये नही सोच पाए।।थोडा जो कुछ बचा कुचाकर देश 1947 में आया।।बैसाखी पकड़ कर धीरे धीरे आगे भी बढ़ा,पर ये क्या इसने तो बैसाखी से चलने को ही भाग्य बना लिया।।।लडखडाता,ठोकर खाता,शायद एक बार को गिरता,पर देर सवेर पैरों पर तो खड़ा होता।।अब बारी आई शरीर में ज़ख्म पड़ने की,और उनके सड़ने की।।।इसमें क्या मुश्किल था।।बंद चीज़ पर तो फफूंदी छाती ही है।।पहले सामजिक कुरीतियाँ,फिर यही राजनीति में घुस गयी।।फंगस शुरू।।साम्प्रदायिकता,धर्मान्धता,कट्टरपन,नक्सलवाद,अलगाववाद,भ्रष्टाचार,एक के बाद एक घाव होता गया,सड़ता गया।।हिन्दू को डर है अपने धर्म के लुटने का,मुस्लिम को खौफ है अपने अल्पसंख्यक शोषण का।।औरत को ऐसे नौच खसौटा जा रहा है जैसे मेमने को चील,इंसान इंसान को छू ने को राज़ी नही,उसके शरीर का सोना झड जाएगा,हर किसी के हाथ दूसरे की जेब में रेजगारी ढूंढ रहे है,नगर तिजोरी की चाबी राजा के पास,वसूली वो करे,खर्च जनता।।।।”अंधेर नगरी चौपट राजा”।।।पर अब मुझे चिंता होती है।।।सिर्फ कमियाँ बताना हल नही,फिर मुझसे बड़ा कोई दोषी नही।।।मेरी इतनी बिसात तो नही कि अकेले सर्जरी कर दूं,पर हाँ इतनी औकात तो है की मरहम पट्टी कर दूं,प्रथम उपचार कर दूं।।।पता है समस्या यही है हम उतना भी नही करते जितना हमारे वश में है,हम उतना भी नही करते।।हर कोई दूसरे के कंधे पर चढ़कर कुम्भ नहाना चाहता है।।।।।बस भी करो।।।पहले भी कहती रही हूँ की देश के हित की लड़ाई को एक रिले दौड़ बना दीजिये,कोई थकेगा भी नही,गिरेगा भी नही।।।एक का सहारा दूसरा,दूसरे का तीसरा,चौथा,पांचवा।।।।हम अपनी सफाई रोज़ करते हैं,घर की सफाई भी हर दीवाली कर ही लेते हैं,और जब बात देश की आती है,तो सदियाँ बीत गयी पर जाले नही हटाये।।देश में आप रहे हैं,देश आपमें नही,हमारे ख़त्म होने से ये फिर भी बच जाएगा,पर अगर ये मुश्किल में पड़ा तो हमारा विनाश पक्का है।।।।उठो,लड़ो,और जीतो।।।।और कोई चारा भी नही।।।।

देश की राजनितिक पार्टीयो का लोकतंत्र कहा है?

देश की राजनितिक पार्टीयो का लोकतंत्र कहा है?

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है लेकिन ये इतनी हास्यास्पद बात है कि हमारे देश के लगभग सारे राजनीतिक पार्टीयो में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। चाहे वो वर्तमान में केंद्र की सरकार चला रही कांग्रेस पार्टी हो या मुख्य विपक्षी दल भाजपा, कही भी लोकतांत्रिक ढंग से न पार्टी अध्यक्ष बनाये जाते है न ही विधायक या सांसद का टिकट दिया जाता है। हाल के घटनाक्रम में हम सबने देखा की कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गाँधी को बनाया गया। न कोई दूसरा उमीदवार था न कोई वोटर था। उसी तरह भाजपा के अध्यक्ष के चुनाव में भी सारे प्रस्तावको से खाली प्रस्तावना पत्र पर हस्ताक्षर कर के माँग लिया गया। ये लोकतान्त्रिक तरीके से चुनाव का मजाक मात्र नही तो और क्या है? हमारे देश की सारी राजनीतिक पार्टीया कहती है – हमारा देश के लोकतंत्र में विश्वास है लेकिन उनकी पार्टी में ही लोकतंत्र नही है। राहुल गाँधी को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पार्टी बनाती है इसके लिए न कोई चुनाव की तारीख की घोशणा होती है न नामांकन दाखील करने की। और हम कहते है की हम एक लोकतांत्रिक ब्यवस्था में रहते है। देश के किसी भी राज्य में चुने हुए विधायक से नही पूछा जाता की मुख्यमंत्री कौन होगा और पार्टी आलाकमान के आदेश पर मुख्यमंत्री चुना जाता है। लोकतंत्र का दंभ भरने वाली राजनीतिक पार्टिया जबतक अपने पार्टी के अंदर लोकतंत्र की बहाली नही करती तब तक देश के राजनीती पर कुछ वंश या परिवारो का कब्ज़ा होकर रह जायेगा। जो की इस देश के लिए सही नही है और न ही लोकतान्त्रिक प्रक्रिया लिए। लेकिन ये तब तक नही बदलेगा जबतक इस देश का आम आदमी इसके खीलाफ नही उठेगा। देश की राजनितिक पार्टीयो का लोकतंत्र कहा है

फुर्सत के पल में

फुर्सत के पल में 
जब हमने , गूगल प्लस , ब्लॉग ,ट्विटर ,फेस बुक,फेस बुक ग्रुप जैसा सोशल मीडिया शुरू करने की ठानी, तो सोचा कि ऐसा क्या है जो इस समय मैं देश ,समाज और अपने लिए सबसे ज्यादा चाहता हूँ या करने में सक्षम हूँ I मुझे .. ज्यादा सोचना नहीं पड़ा- हम अपने फुर्सत के कुछ पल को देश ,समाज और स्वयं के लिए समर्पित कर रहे हैं I हम अपने परिवार के भरपूर सहयोग से हीं जो कुछ भी संभव है कर रहा हूँ I इन पलों में मैं या तो कुछ सोंचता रहता हूँ ,सामाजिक क्रियाकलापों में भाग लेता रहता हूँ या फिर कुछ लिखता रहता हूँ.. उन्हीं चीज़ों को मै आप सम्मानित मित्रों को गूगल प्लस , ब्लॉग ,ट्विटर ,फेस बुक,फेस बुक ग्रुप जैसा सोशल मीडिया में उतार कर आप सभी को पड़ोस रहा हूँ | यहाँ मै अपनी ख़ुशी, उदासियाँ, कल्पनाएँ ,सामाजिक उत्तर दाइत्व तथा और भी बहुत कुछ साझा करने की कोशिश कर रहा हूँ | उम्मीद ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है आप सभी स्नेहिल मित्रों का नैतिक समर्थन समीक्षात्मक टिप्पणियों के जरिये मुझे प्रेरणा देते रहेगा I ..........सादर ... रमेश कुमार चौबे

हमारी मांग है आई . पी. एल.की अब तक की सम्पूर्ण गतिविधियों की पूरी जाँच कराई जाय

 हमारी मांग है आई . पी. एल.की अब तक की सम्पूर्ण गतिविधियों की पूरी जाँच कराई जाय I बी , सी सी आई की पूर्ण गरिविधियों की भी जाँच होनी चाहिए I इन दोनों की सम्पूर्ण आय व्यय की पूरी पारदर्शिता से जाँच होनी चाहिए I मेरा मानना है सफेदपोस , उद्द्योग पतियों, फ़िल्मी सितारों और भ्रष्ट मीडिया घरानों की आपसी मिली भगत से हीं आई . पी. एल. और बी , सी सी आई में गोरखधंधा का खेल खेला जाता है I आई . पी. एल. और बी , सी सी आई की गोरखधंधों में कांग्रेस और भाजपा के टॉप टॉप नेताओं की सामान रूप से सहभागिता है I वहीँ भारतीय व्यपार जगत के दिग्गजों और भारतीय सिनेमा के दिग्गजों का घालमेल भी जग जाहिर है I आई . पी. एल. और बी , सी सी आई के जरिये सफेदपोसों और ऐयास उद्ध्योग्पतियों तथा फ़िल्मी सितारों ,कार्पोरेट जगत के वरीय अधिकारीयों की सभी इक्षाओं की पूर्ति होती है I देश के नवजवान खेल के पीछे के इस खेल में अपना बहु मुल्य समय बर्बाद कर रहे हैं I जनता की गाढ़ी कमाई का इस्तेमाल ये संसाधनों के जरिये करते हैं और स्वयं मालोमाल होते हैं I
शब्दों की यात्रा में, शब्दों के अनगिनत यात्री मिलते हैं, शब्दों के आदान प्रदान से भावनाओं का अनजाना रिश्ता बनता है

एक दिन हमारी मुलाकात होगी

एक दिन हमारी मुलाकात होगी,
हमारी यादें फिर साथ होंगी,
फिर मैं पुरानी बातें सुनाऊंगा ,
कुछ अपने दिल की बात सुनाऊंगा ,
फिर आँखों से हमारी बरसात होगी,
एक दिन हमारी ....................

पहले तो मैं सुनाऊंगा , तुम क्यूँ मुझसे दूर रही 
मुझे याद किया या प्रिये मुझको भूल गई 
मस्त पवन जब आती थी प्रिये मेरी कहानी वो सुनाती थी 
क्या प्रिये तुम रातों में मेरी यादों से जगती थीं
मैं तड़पता था इतना जितना प्यासे को पानी की तलाश होगी
एक दिन हमारी ................

हम तो पपीहे की तरह रहते थे
पतझड़ की तरह रोते थे
न आँखों में नींदें थी न सोते थे
बस प्रिये तुमसे मिलने को , दिन रात सोचा करते थे
न जाने वो दिन कब आएगा तेरी बाहों में रात ढल जायेगा
हम साथ बैठेंगे और प्यार भरी बात होगी
एक दिन हमारी मुलाकात होगी

छत्तीसगढ़ में खाद्य सुरक्षा योजना में भारी भ्रष्टाचार

छत्तीसगढ़ में खाद्य सुरक्षा योजना में भारी भ्रष्टाचार 
भूख और गरीबी मिटाओ का नारा देकर छत्तीसगढ़ में चलाई जा रही खाद्य सुरक्षा योजना में भारी भ्रष्टाचार और घोर अनियमितता का नजारा खुलेआम देखा जा सकता है I गरीबों को मुफ्त में या सस्ते दर पर मिलने वाला राशन प्रशासन ,सफेदपोसों , सत्ताधारी दल के कार्यकर्तायों और जनवितरण प्रणाली के संचालकों की मिली भगत से खुले बाजार में बिकता है I बीपीएल और एपीएल के नाम पर सुराज्य का नारा देने वाली रमण सरकार में भ्रष्टाचार का बोल बाला सर्व विदित है I चाउर वाले बाबा की मंडली लूट तंत्र में पूर्ण रूपेर्ण भागीदार है I
छत्तीसगढ़ राज्य में दिखावे के तौर पर जो पैमाना तय किया गया है उसमें बड़े भूस्वामियों जो कि कर दाता हैं, उन्हें छोड़कर सभी को खाद्य सुरक्षा योजना में शामिल किया गया है। इसके कारण छत्तीसगढ़ में खाद्य सुरक्षा से 90 प्रतिशत लोग आच्छदित हो गए हैं I जिसके परिणाम स्वरुप घोर अनियमितता और गरीबों को मुफ्त में या सस्ते दर पर मिलने वाला राशन प्रशासन ,सफेदपोसों , सत्ताधारी दल के कार्यकर्तायों और जनवितरण प्रणाली के संचालकों की मिली भगत से खुले बाजार में बिकता है I छत्तीसगढ़ में एक रुपए प्रति किलोग्राम की दर से प्रति परिवार प्रति माह 60 किलोग्राम अनाज दिया जा रहा है I पांच रुपये प्रति किलोग्राम की दर से प्रति परिवार प्रति माह दो किलोग्राम चना दिया जा रहा है I पच्चास पैसे प्रति किलोग्राम की दर से प्रति परिवार प्रति माह दो किलोग्राम नमक दिया जा रहा है I तेरह रुपये प्रति किलोग्राम चीनी और केरोसिन तेल दिए जा रहे हैं I आप सोंच सकतें हैं जरुरत मंदों के नाम पर सुराज्य के नारा देने वाली सरकार कितना बड़ा भ्रष्टाचार का नेटवर्क तैयार की है I अगर ये सुराज्य हीं लाना चाहते हैं तो क्यों न ये उपभोक्ताओं को कैश सब्सिडी के रूप में उन तक मूल्य राशि बैंक खाता के जरिये पहुंचाते हैं ?

बलात्कार की बढ़ती घटनायों को रोकने के लिए भारत में वेश्यालयों को कानूनी मान्यता और सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए

बलात्कार की बढ़ती घटनायों को रोकने के लिए भारत में वेश्यालयों को कानूनी मान्यता और सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए 

वेश्यालय वह स्थान होता है जहाँ पर पैसे देकर संभोग किया जाता है। वेश्यावृत्ति दुनिया के सबसे पुराने पेशों में से एक है। इसका जिक्र बाइबिल में मिलता है। प्राचीन इजरायल में भी वेश्यावृत्ति को मूक सहमति मिली हुई थी। 
दुनिया के कई हिस्सों में इसे अवैध भी माना जाता हैं। कई देशों में इसे सरकार का समर्थन भी प्राप्त है। जो लोग इस तरह की सर्विस का लाभ उठाना चाहते है, उनके लिए दुनिया में ऐसे बहुत सारे विकल्प मौजूद हैं, जहां वे वेश्याओं के साथ सेक्स का आनंद ले सकते हैं। ]
अमेरिका के चेक रिपब्लिक स्थित बिग सिस्टर को किसी भी ग्राहक की यौन संतुष्टि का इकलौता ठिकाना माना जाता है। यहाँ चेक और स्लोवाक महिलाएँ मुफ्त में सेवाएँ देती हैं, लेकिन इसके बदले में संबंध बनाने के पूरा वीडियो रिकॉर्ड करने का करार किया जाता है। इसे स्थानीय बाजार में और देश के बाहर बेचा जाता है। जससे अपरोक्ष रूप से सरकार के माध्यम से सेक्स वर्कर को और प्रत्यक्ष रूप से सरकार बड़े राजश्व की प्राप्ति होती है I
इसी तरह बैकांक में भी अय्याशी के कई अड्डे है। थाईलैंड में भी सेक्स एक्ट और पैसे का लेन-देन ग्राहक और वेश्यायों के बीच होता है। दलाल का यहाँ कोई काम नहीं है।
ऑस्ट्रेलिया में कई तरह के वैध वेश्यालय मौजूद हैं, सिडनी स्थित 'द साइट' पर आपका स्वागत है। वेश्यालय अपने विज्ञापन में वाइल्ड, रॉन्ची और हॉट व सुनहरे बालों वाली लड़कियां देने का दावा करता है।
लॉस एंजिलिस स्थित नाइट क्लब में वेश्यालय भी चालू रहता है।
अमेरिका के नेवाडा स्थित होटल रिट्ज कार्लटन का वैध वेश्यालय है। मुस्टांग रैंच वेश्यालय से ज्यादा लग्जरी होटल लगता है। यहां आने वाले मेहमानों से पैसे नहीं लिए जाते हैं, लेकिन प्रत्येक मेहमान को स्टाफ में मौजूद लड़की के साथ समय बिताने के लिए पैसे देने ही होते हैं। अकेले आने वालों और अपने साथ पार्टनर लाने वालों की कोई पूछ नहीं होती।
स्टिलेटो का दावा है कि यह दुनिया का छोटा बेहतरीन बुटिक होटल और वेश्यालय है।
फ्रांस में वेश्यावृत्ति कानूनी है। 2003 में सेक्स कानून के तहत इसे वैध किया गया। स्थानीय वेश्यालयों ने इसका फायदा उठाया और इस पेशे में कुछ नया किया। उपनगरीय इलाकों में सड़क पर सफेद वैन खड़ा कर दिया जाता है। यदि दरवाजा खुला है, तो समझें बिजनेस के लिए चालू है। यदि दरवाजा बंद है तो आपको थोड़ा इंतजार करना होगा, क्योंकि अंदर कोई और है।
जर्मनी के बर्लिन शहर स्थित ब्रॉथल (वेश्यालय) में यूरोपियन मंदी का असर दिखने लगा था। इस दौरान उन्होंने इनकम बढ़ाने के लिए नया तरीका इजाद किया। साइकिल या पब्लिक ट्रांसपोर्ट से आने वाले लोगों को उन्होंने डिस्काउंट देने का फैसला किया। उन्होंने दावा किया कि इससे पर्यावरण सुरक्षित हो सकता है। इससे ब्रॉथल के बाहर लगने वाली वाहनों की कतार कम होगी और सरकार की आमदनी बढ़ेगी।
जर्मनी स्थित 29 हजार स्क्वॉयर फुट में 12 मंजिला इमारत में यह वेश्यालय दिन भर चालू रहता है। यहां करीब 120 वेश्याएं हर दिन एक हजार से ज्यादा ग्राहकों को सेवाएं देती हैं। इसे यूरोप का सबसे बड़ा ब्रॉथल कहा जाता है। बांग्लादेशी लड़कियों की शादी बहुत कठिन होती है, क्योंकि मूल बंगाली परिवार के ज़्यादातर वर घुसपैठिया बहू स्वीकार नहीं करते. इसी सामाजिक अलगाव का फायदा दलाल उठाते हैं और उनसे ख़ुद शादी करके या किसी दूसरे से कराकर उन्हें देश के विभिन्न नगरों के कोठों पर बेच दिया जाता है Imeaning of veshyalay in English , WHORE-HOUSE , BROTHEL ,HOUSE OF PROSTITUTION , STEW BAWDYHOUSE , CATHOUSE ,SPORTING HOUSE , BORDELLO I भारत के कोलकत्ता में एशिया का प्रसिद्ध बदनाम वेश्यालय है। जहा शाम होते ही हजारों योन कर्मी मेनका का वेष बनाकर देह- क्रेताओ के अभिन्दन में खड़ी होती है। सैकड़ों वर्षो से यहाँ बाजार लगता है। परन्तु भारत में कोई वैध कानून नहीं होने के कारण अक्सर पुलिस का छापा पड़ता है जहा से खरिदारो को पकड़ कर जेलो में बंद कर देते है प्राचीन भारतीय समाज ने इस वयवस्था को जन्म दिया ओर अब तक इसे किसी न किसी रूप में सुरक्षित रखा है। प्राचीन भारतीय समाज का मानना था वेश्यालयो के रहने से बलत्कार जैसे घटनाये कम होते है I भारत में सेक्स का व्यापर कानूनी मान्यता नहीं होने के कारण भी चोरी छुपे बड़े पैमाने पर होता है I इसे कानूनी मान्यता मिलने से सरकार को प्रति वर्ष अरबों रुपये की वैध राजश्व प्राप्त हो सकता है I आज कानूनी मान्यता के आभाव में सरकार को प्रति वर्ष राजश्व की भारी क्षति होता है और पुलिस , विचौलिये , सफेदपोस तथा व्यापारी को इसका लाभ मिलता है I सबसे ज्यादा नुकसान ग्राहकों और वेश्यायों को झेलना पड़ता है I परिणाम स्वरूप बलात्कार की घटनाएँ बढ़ती हीं जा रही है I
संसद की सर्वोचता को मिटाकर समाज की सर्वोचता कायम रखना हीं व्यवस्था परिवर्तन है
भारतीय संसद वेश्यायों की वस्ति से भी ज्यादा बदनाम हो गई है
सब्जी मंडी के कम तौल व्यपारी ,सडा हुआ मांस के टुकडे पर झपट पड़ने वाला गिद्ध , मैला खाने वाला सूअर जब पुन्य काम करने लगे तो समझो अगले जन्म में वो भारतीय संसद का माननीय सदस्य होगा I
इस जन्म का कुत्ता , सूअर और कीड़ा मकोड़ा जब पुण्य कार्य करने लगे तो समझो अगले जन्म में वह क्रमशः भ्रष्ट मंत्री ,सरकारी पदाधिकारी और सरकारी कर्मचारी बनेगा I

हम भारतीय संसद के केन्द्रीयकृत सत्ता के अस्तित्व को मिटाकर अकेन्द्रीयकृत व्यवस्था लागू करेंगे

 हम भारतीय संसद के केन्द्रीयकृत सत्ता के अस्तित्व को मिटाकर अकेन्द्रीयकृत व्यवस्था लागू करेंगे I अब एक हीं विकल्प लोक स्वराज मंच क्योकि सब सुधरेगा तिन सुधारें , नेता , कर , कानून हमरे I हम राज्य पर समाज की संप्रभुता स्थापित करने की तैयारी में जुटे हैं I भारत का प्रस्तावित संविधान और लोक संसद के मुद्दे पर लोक स्वराज्य मंच ने पुरे देश में व्यवस्था परिवर्तन अभियान के तहत भारत भ्रमण यात्रा के जरिये जन जागरण अभियान चलाया है I लोक स्वराज्य मंच से जुड़ने के लिए संपर्क करे I श्री बजरंग मुनि मोबाइल नंबर -09617079344 श्री सिद्धार्थ शर्मा मोबाइल नंबर - 09632149431 श्री रमेश कुमार चौबे मोबाइल नंबर - 08435023029

वह दिन दूर नहीं

वह दिन दूर नहीं होगा जब अनठानबे प्रतिशत आम जनता देश के बामुश्किल दो प्रतिशत धन कुबेरों के अर्जित धन और संपत्ति पर जन क्रांति के जरिये कब्ज़ा जमाएगी I अनठानबे प्रतिशत आम जन के बीच समानुपाती ढंग से भ्रष्टों की अर्जित संपत्ति और काले धन को वापस लाकर बाटा जायेगा I देश क्रांति के मुहाने पर है I जनता का गुस्सा ज्वालामुखी की तरह किसी भी समय फट सकता है I जनता की गुस्सा को कमतर आंकने की भूल ना करे संसद में बैठने वाले जनता के गद्दार सांसद I संसद उनकी जागीर नहीं रह पायेगा I संसद का हम पर कतरेंगे I देश में लोक स्वराज्य लायेंगे I बदनाम हो चुकी वर्त्तमान संसद को लोक नियंत्रित बनायेंगे I सत्ता परिवर्तन अब बहुत हो चूका अब तो व्यवस्था परिवर्तन की तैयारी है I

लोक स्वराज मंच 2019 की तैयारी में है

लोक स्वराज मंच 2019 की तैयारी में है I हम सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए राजनीति के मैदान में आ रहे हैं I यकीन मानिये हम राजनीति करने नहीं , इसे बदलने आ रहे हैं I 2019 में महा संग्राम होगा I जनता का संविधान और जनता का मेनिफेस्टो लागू होगा I हम राज्य पर समाज की संप्रभुता स्थापित करने की तैयारी में जुटे हैं I भारत का प्रस्तावित संविधान और लोक संसद के मुद्दे पर लोक स्वराज्य मंच ने पुरे देश में व्यवस्था परिवर्तन अभियान के तहत भारत भ्रमण यात्रा के जरिये जन जागरण अभियान चलाया है I लोक स्वराज्य मंच से जुड़ने के लिए संपर्क करे I श्री बजरंग मुनि मोबाइल नंबर -09617079344 श्री सिद्धार्थ शर्मा मोबाइल नंबर - 09632149431 श्री रमेश कुमार चौबे मोबाइल नंबर - 08435023029

कब तक चुप रहोगे आप ?

कब तक चुप रहोगे आप ? राजनीति बन रही तवायफ नेता बन गए दलाल I धर्म का चोला ओढकर भैया धर्म गुरु सब हुए व्यापारी I जनता मालिक हुई बेचारी, जन सेवक बन बैठे मालिक I पुलिस पहरुए चोर से मिल कर, मालिक के घर सेंध मरावे I नौकर खाए मेवा मलाई ,मालिक सुखी रोटी खाए I जनता के पैसा से भैया राजनेता सब ऐस मानावे I खून पसीना बहाकर भैया, किसान देश में अन्न उपजावे और वही किसान भूखे सो जावे ? देश की सरहद पर भीषण गर्मी और सर्दी में देश का रक्षक रक्षा करे और वातानुकूलित कमरों में बैठकर राजनेता सब अपने हित में विदेशियों से सौदा करे I भारत के काले धन से भैया, स्विस बैक का खजाना भरे और भारत देश लगातार विदेशी कर्जों की भोझ तले दबे ? भारत का नवजवान अब जाग चूका है , देश की जनता जाग चुकी है ,खेतिहर किसान अब जाग चुके है , देश का प्रहरी जवान अब जाग चुके हैं I हिन्दू (सिख हिंदुत्व का हीं अभिन्न अंग है ) ,मुस्लिम और ईसाई ये सभी भी अब जाग चुके हैं I नेताओं को ये पहचान चुके हैं I कुछ चंद जो सोये हुवे हो कब तक चुप रहोगे आप ?

संसद भारतीय लोक तंत्र का प्रतिक होनी चाहिए जो की नहीं हो सका

संसद भारतीय लोक तंत्र का प्रतिक होनी चाहिए जो की नहीं हो सका I हमने संसद को लोक नियंत्रित तंत्र के रूप में विकसित करने का स्वप्न देखते हुए संसदीय प्रणाली को आत्मसात किया I परन्तु षड़यंत्र के तहत हमारा देश तंत्र नियंत्रित हो गया I असली मालिक नौकर की भूमिका में और हमारा नौकर मालिक की भूमिका में आ बैठा है I आजादी के 67 वर्ष बीत गए I हमारा देश केन्द्रीयकृत संसदीय सत्ता का केंद्र बन गया I यह सब सत्ता लोलुप सत्ता पक्ष और सुविधा भोगी प्रतिपक्ष के षड़यंत्र के कारण हुआ है I हमारा मैनेजर (सत्ता पक्ष /सत्ताधरी पार्टी ) तो चोर बन हीं गया हमने चोरी को रोकने के लिए या रखवाली के लिए प्रतिपक्ष रुपी वाच डॉग यानि सजग कुत्ता जो संसद में बैठाया वो भी मांस के टुकडे और जूठन खाकर मालिक के साथ नमक हरामी कर बैठा I हमने अब सोंचा है हम अब अपने नौकर और पालतू कुत्ते के भरोसे अपनी संपत्ति को यू हीं नहीं छोड़ेंगे I हम अब सहभागी लोक तंत्र बनायेंगे और समाज नियंत्रित / लोक नियंत्रित शासन प्रणाली लागू करेंगे I आप यकीन कीजिये हम राज्य पर समाज की संप्रभुता स्थापित करने की तैयारी में जुटे हैं I भारत का प्रस्तावित संविधान और लोक संसद के मुद्दे पर लोक स्वराज्य मंच ने पुरे देश में व्यवस्था परिवर्तन अभियान के तहत भारत भ्रमण यात्रा के जरिये जन जागरण अभियान चलाया है I लोक स्वराज्य मंच से जुड़ने के लिए संपर्क करे I श्री बजरंग मुनि मोबाइल नंबर -09617079344 श्री सिद्धार्थ शर्मा मोबाइल नंबर - 09632149431 श्री रमेश कुमार चौबे मोबाइल नंबर - 08435023029 , श्री दीपक कुमार जायसवाल मोबाइल नंबर 09575566074

जरा सोंचो

जरा सोंचो जब मंदीर का पुजाड़ी मंदिर में मांस मदिरा का सेवन करने लगे और मस्जिद का मुल्ला भी जब मस्जिद में शराब शबाब का सेवन करने लगे और गिरिजा घर का फादर गिरिजा घर को ऐयासी का अड्डा बना दे तो उन धर्मो के धर्मावलम्बी क्या करेंगे ? उसी तरह लोक तंत्र के मंदीर संसद भवन में जब हमारे चुने गए लोक सेवक अपने को मालिक और जनता को नौकर समझने लगे तो हमें क्या करना चाहिए I चुप्पी तोड़ो ऐसा तमाचा उन जालिमों के गा्ल पर मारो की ताजींदगी वे आपकी चमचा को याद रखे और यह तमाचा है सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन I

झारखंडी/छत्तीसगढ़ी गरीबों का किशमिश – महुआ


झारखंडी/छत्तीसगढ़ी गरीबों का किशमिश – महुआ महुआ का झारखंड से बहुत ही गहरा संबंध रहा है. गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर अपने गिरिडीह प्रवास के दौरान जिस घर में रहते थे, उस घर पर रहते हुए उन्होंने महुआ नाम की एक कविता भी लिखी थी जहां वर्तमान में महिला काॅलेज चल रहा है. गुरूदेव टैगोर ने साहित्य में तो महुआ को स्थान दिला दिया परंतु बहुताय में पाया जाने वाला महुआ का झारखंड़ में वो स्थान प्राप्त नहीं हुआ जबकि आदिवासी और दलित बहुल राज्य झारखंड़ के ग्रामीण इलाकों में कई महीने चुल्हा महुआ बेच कर भी जलता है. चिंताजनक बात यह है कि राज्य में महुआ के फल से गैरकानूनी ढ़ंग से शराब बनाने का धंधा ग्रामीण इलाकों में घर-घर में पाया जाता है जिससे ग्रामीणों का दाल-रोटी की व्यवस्था तो हो जाती है परंतु वैसे घरों के किशोर व युवकों का भविष्य खतरे में पड़ गया है. कम उम्र से ही महुआ के शराब की लत नवयुवकों को लग जाती है जो नशे की अवस्था में कई अन्य अपराधिक प्रवृतियों को जन्म देती है. महुआ की पैदावार ज्यादा होने के कारण ग्रामीणों द्वारा इसे पड़ोसी राज्यों यथा ओडि़शा, छतीसगढ़ और पश्चिम बंगाल को औनेपौने दाम में बेच दिया जाता है. महाराष्द्र सरकार के लिए जो महत्व अंगूर का है, गोवा सरकार के लिए जो महत्व काजू का है वहीं महत्व झारखंड़ सरकार के लिए महुआ का हो सकता है परंतु महुआ आधारित शराब उद्योग झारखंड़ में नहीं है जबकि महाराष्द्र सरकार अंगूर से शराब बनाने का तथा गोवा में काजू से फेनी नामक शराब बनाने का वकायदा उद्योग है जिससे संबंधित सरकारों को राजस्व की प्राप्ति होती है. झारखंड़ सरकार को भी महुआ आधारित शराब उद्योग लगाने की दिशा की ओर पहल करना चाहिए जिससे राज्य के ग्रामीण इलाकों में आज घर-घर में शराब बनाने का धंधा चल रहा है वो बंद हो सके और ग्रामीण युवकों को शराब के नशे से बाहर निकाला जा सके, इसके अतिरिक्त सरकार को राजस्व की प्राप्ति होगी सो अलग. उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों के जमाने में ब्रिटिश सरकार के मदद से राय बहादुर ठाकुर दास ने महुआ के फल और फूल के जांच के बाद इससे शराब बनाने का पहला डिस्टेलेरी रांची में सन् 1875 ई. में रांची डिस्टेलेरी के नाम से लगाया था. रांची डिस्टेलेरी के सभी मशीन और उसके कल-पूर्जे स्काटलैंड, बरबिंघम और मैनचेस्टर से मंगावाये गये थे. वर्तमान में रांची डिस्टेलेरी में महुआ से शराब नहीं बनाया जाता क्योंकि यह गैरकानूनी करार दिया गया है. महुआ से बेहतरीन शराब बनायी जा सकती है अगर इसे सही ढ़ंग से डिस्टेलेरी में बनाया जाए परंतु ऐसा नहीं होने के कारण राज्य के ग्रामीण इलाकों में चोरी-छिपे घरों में यूरिया, नौशादर और कई सस्ते रसायनों को मिलाकर जानलेवा शराब या ‘हूच’ बनाया जाता है तथा जिसके सेवन से कई बार ग्रामीण मौत के शिकार तक हो जाते है. प्रसिद्ध जीव वैज्ञानिक चाल्र्स डार्विन के वंशज फेलिक्स पैडल, जो मानवशास्त्री और इंस्टीच्यिूट आॅफ रूरल मैनेजमेंट, आनंद के विजिटिंग प्रोफेसर है, अपने झारखंड़ प्रवास के दौरान महुआ के स्वाद को चखने के बाद आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि राज्य सरकार क्यों नहीं महुआ आधारित उद्योग को अब तक विकसित किया और उन्होंने यह भी कहा था कि भारतीय क्यों फ्रेंच और इंग्लिश स्कोच लेते है जबकि उनके पास महुआ जैसे बेहतरीन फल मौजूद है. झारखंड़ में प्राय सभी 24 जिलों में महुआ ही एकमात्र फल है जो बहुताय में पाया जाता है. वनों में निवास करने वाले आदिवासी व गैर आदिवासी परिवार चैत-वैशाख महीने में महुआ के फल को चुन-चुन कर इकटठा करते है और गांव के सप्ताहिक हाट में पड़ोसी राज्य यथा ओडि़शा, छतीसगढ़, पश्चिम बंगाल से आए व्यापारियों द्वारा निर्धारित मूल्यों पर बेचने के लिए मजबूर देखे जा सकते है. गिरिडीह के ग्रामीण इलाकों में फलची-परदहा गांव निवासी धनेश्वर तूरी कहते है कि जब वो छोटे थे तो उनका परिवार महुआ चून कर अच्छे मूल्य पर बेच देता था और उनका पूरा परिवार खूशी-खूशी सिर्फ महुआ चून कर सालभर खा लेता था परंतु आजकल तो पूरे महीने महुआ चुनकर और उसे बेचकर एक महीने का भी राशन जुटाना मुश्किल है. नाम नहीं बताने के शर्त पर चतरो गांव के निवासी ने बताया कि महुआ के फलों को चुनने के लिए उसका पांच सदस्यों का परिवार सूबह चार बजे से दस बजे दिन तक लगा रहता है, चालीस-पचास किलो महुआ चुनने के बाद उसे धोना पड़ता है फिर सूखाना पड़ता है तब हाट ले जाया जाता है जहां तीस रूपए मन से ज्यादा नहीं मिल पाता है इसलिए घर पर ही शराब बनाने लगे और बेचने लगे. पुलिस जब आती है तो एक-दो बोतल दारू और एक-डेढ़ सौ रूपया दे दिया करता हॅंूं. इस तरह गुजारा हो जाता है. गांवों में दलित, आदिवासियों के ऐसे कितने ही घर है जो गैरकानूनी ढ़ंग से महुआ का शराब बनाते है. गिरिडीह जिला अंतगर्त मंझलाडीह गांव के प्राय सभी आदिवासी घरों में महुआ से शराब बनाने की परम्परा चली आ रही है. शराब बनाने के बाद उसे बीयर के बोतलों में भरकर थैली में लेकर दूर-दूर तक लोग बेचने चले जाते है. दूर-दराज गांवों में समृद्ध परिवार वाले जैसे रोज दूध लेते है उसी तरह महुआ का शराब भी रोज लेते है. राज्य सरकार को गंभीरता से इस ओर ध्यान देना होगा कि झारखंड़ के गांवों में घर-घर में देशी डिस्टेलेरी होने से वैसे लाखों परिवारों का भविष्य क्या होगा जो शराब बनाते है जिसे ग्रामीण चुआना कहते है, तथा जिसमें बच्चे और महिलाएं भी शमिल रहते हैं.

Saturday, 18 May 2013

लोक सभा न विधान सभा, सबसे ऊंची ग्राम सभा


लोक सभा न विधान सभा, सबसे ऊंची ग्राम सभा

-बह्म देव शर्मा
बह्म देव शर्मा
7 मार्च 2010 को उत्तर प्रदेश के सामाजिक कार्यकर्ताओं की बैठक में संबोधन… इस बैठक में आए समाजसेवी गांव गांव में सन्देश पहुंच रहे हैं कि गांवों का विकास ग्राम सभाओं से ही होगा। और आने वाले पंचायत चुनाव में ऐसे व्यक्ति को ही प्रधान बनाया जाए जो ग्राम सभा कराए। इन कार्यकर्ताओं के साथ संबोधन और बातचीत के दौरान गाँधीवादी विचारक एवं सामजसेवी श्री बी.डी. शर्मा जी ने वर्तमान व्यवस्था की विसंगतियों को ग्राम स्वराज के नज़रिए से स्पष्ट किया। उनके वक्तव्य के अंश यहां प्रस्तुत हैं –
1857 में आज़ादी के पहले आन्दोलन को अंग्रेजों ने दबा तो दिया लेकिन बहुत मशक्कत के बाद दबा पाए। तब उन्होंने एक कमीशन बनाया, सर ए. ओ. ह्यूम की अध्यक्षता में। यह समझने के लिए कि ये सब हुआ कैसे? इतना बड़ा संघर्ष हुआ कैसे और इसकी हमें कानों कान कोई खबर नहीं लगी। आयोग दो-तीन साल जगह जगह घूमा। बाहरी लोगों को हमारी जिन्दगी की सामान्य बाते बड़ी मुश्किल से समझ आती है। जब अंग्रेजों ने जांच की तो उन्हें कुछ बाते अजीब लगीं। उन्होंने कहा कि यहां पर गांव एक “समाज´´ है. इस देश में गांव “समाज´´ है, जो अपनी व्यवस्था स्वयं करता है। वह किसी पर निर्भर नहीं है। यदि कोई अकस्मात बात होती है या खतरा आता है तो गांव समाज उसका प्रतिकार करता है। ए.ओ. ह्यूम ने भी ये कहा है कि “ये समाज ऐसा है कि जब कोई संकट आता है एक हो जाता है और उसके बाद फिर अपने अपने काम में लग जाता है, तो जब तक कि इस देश में गांव समाज को खत्म नहीं किया जाता तब तक आपका साम्राज्य स्थायी नहीं रह सकता। इस प्रकार का विद्रोह आपको झेलना ही पड़ेगा।´´ ये उनका फैसला था। इसका नतीज़ा यह हुआ कि 1860 के बाद जितने भी कानून बने उनमें से किसी भी कानून में गांव समाज के लिए कोई स्थान नहीं दिया। ऐसा कोई कानून नही जिसमें गांव समाज की कोई भूमिका हो। आपस में झगड़ा हो जाए तो अदालत, न्याय पंचायत आदि बना दिए गए. आप आपस में बात करके झगड़ा सुलझा सकते हैं पर (कानूनन) सुलझा नहीं सकते. इसके लिए पुलिस है, अदालत है। गांव में जितने भी काम हैं राज्य को दे दिये गए। आपका खेत आपका है या नहीं वो गांव नहीं तय करेगा बल्कि पटवारी और अफसरों के पास मौजूद कागज़ों से तय होगा। अब जिसका खेत दादा के ज़माने से चला आ रहा है, पर कहीं उसके विपक्षी ने जालसाजी कर उसकी जमीन के कागज़ातों पर अपना नाम लिखा लिया तो कानूनन अब वो खेत उसका हुआ। अगर आप अदालत में जाएं तो सबसे पहले वकील यही बोलेगा।
गांव तो जैसे पहले अंग्रेजो के समय में गुलाम था आज भी वैसे ही गुलाम है। सरकार ने जो हुकुम दे दिया वो ग्राम सभा का काम है और जो हुकुम नहीं दिया वो ग्राम सभा का काम नहीं। ये कानूनी व्यवस्था अंग्रेजों ने इसलिए बनाई थी कि उनका साम्राज्य कभी टूटे नहीं। इसके बावजूद आज़ादी की लड़ाई में आप देखेंगे कि सबसे ज्यादा योगदान गाँव समाज का ही है। संयुक्त परिवार थे, गांव समाज में जिसके दिमाग में भी आया वो चल दिया, घर के बाकी लोगों ने मिलकर उसके परिवार की ज़िम्मेदरई निभाई। समाज टूट नहीं पाया अंग्रेजों के बावजूद और आज़ादी आई।
खैर, जब संविधान बन रहा था तब गाँधी जी ने राजेन्द्र प्रसाद से कहा था कि इस संविधान में गांव और किसान के बारे में क्या लिखा है? राजेन्द्र जी ने बताया इसमें तो दोनों में से किसी के बारे में नहीं लिखा है। तब गाँधी जी ने पूछा कि ये किसका संविधान है? जिसमें समाज के लिए, किसान के लिए कोई स्थान नहीं तो वो संविधान भारत का कैसे हो सकता है? उसके बाद गाँधी जी ने “हरिजन´´ में एक लेख लिखा। उसके बाद कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया कि इसके लिये स्थान बनाया जाए। तब जाकर संविधान में अनुच्छेद 40 जिसमें पंचायती राज की बात है, उसको उसको रखा गया।
बाद में संविधान सभा में उस पर बहस हुई। अन्त में जाकर ये बात तय हुई कि हर गांव जो है वो गणराज्य के रूप में कार्य करेगा। जब गाँधी जी से पूछा गया कि आपके सपने का भारत क्या है? तो उन्होंने बताया कि “60 लाख गांव गणराज्य राज्य का महासंघ´´. तो अनुच्छेद 40 जो रखा गया तो उसमें कई बुनियादी बातें फिर से आई। एक बात ये आई कि इसमें हम गांव गणराज्य कि बाते कर रहे हैं पर इसमें तो केन्द्रीकृत व्यवस्था है. तो ये केन्द्रीकृत व्यवस्था ऊपर रहेगी या गांव गणराज्य? क्या इसमें ग्राम गणराज्य व्यवस्था ऊपर रह सकेगी? तो इसमें राजेन्द्र प्रसाद जी ने गलती स्वीकार की। उन्होंने कहा था कि “संविधान बनाए ही नहीं जाते संविधान बनते भी है अपने आप… जैसे जैसे हम चलेंगे धीरे-धीरे ये केन्द्रीकृत व्यवस्था कमजोर हो जायेगी और व्यवस्था अकेन्द्रीकृत होती रहेगी और हम सही आदर्श लोकतान्त्रिक व्यवस्था की ओर बढ़ेंगे… और गांव को अगर हम केन्द्र में लाते हुए संविधान बनाएंगे तो संविधान बनाने में बहुत देर हो जायेगी।´´
संविधान सभा में ये स्वीकार हुआ कि अनुच्छेद 40 में गांव गणराज्य जैसी व्यवस्था होगी लेकिन वो नहीं हुआ। उसमें एक शब्द की वजह से तमाम चक्कर पड़ गया। अनुच्छेद 40 अगर आप देखेंगे कि राज्य ऐसी पंचायतों का गठन करेगा और उनको ऐसी शक्तियां प्रदान करेगा जो उनको स्वायत्त रूप में काम करने के लिए जरूरी है। पंचायत शब्द जब गांव में इस्तेमाल होता था तो उसका मतलब होता था गांव के सभी लोग। कभी हमारे गांवों में पंचायत शब्द गांव की चुनी हुई सभा के रूप में नहीं हुआ। लेकिन अब संविधान में व्यवस्था आ गई और (फिर कानून भी बन गया) और पंचायत का मतलब चुने हुए लोगों की पंचायत हो गया और ग्राम सभा उसमें पीछे छूट गई।
इसके बाद कई जगहों पर ग्राम सभाओं का उल्लेख आया। सबसे पहले बलवन्त राय मेहता कमेटी ने स्पष्ट रूप से लिखा कि “ग्राम सभाओं को दायित्व दिये जा सकते हैं जिम्मेदारी नहीं।´´ इसी तरह अशोक मेहता कमेटी बनी जिसमें उस समय के काफी दिग्गज लोग शामिल थे। मैं उस समय में भारत सरकार में गृह मन्त्रालय में था। मैं उस कमेटी में गया और मैनें अपने आदिवासी क्षेत्रा के अनुभव के आधार पर कहा कि ग्राम सभा की केन्द्रीय भूमिका होनी चाहिए क्योंकि ये आदिवासी क्षेत्र में सामान्य बात है कि चुनी हुई चीज कुछ नहीं होती सब लोग इकट्ठा होते है। और अपनी व्यवस्था स्वयं करते है, उसमें किसी के दखल की जरूरत नहीं पड़ती हैं, कुछ गलतियां है जिसको सुध्रना भी चाहिए. जैसे अनुच्छेद 40 मे लिखा है कि “राज्य पंचायतों को बनाएगा और उसको अधिकार देगा´´। दुर्भाग्य से अशोक मेहता कमेटी ने भी ये बात नहीं मानी और ये लिखा कि “ग्राम सभाओं को कुछ कर्तव्य दिये जा सकते है अधिकार नहीं।´´ इसके बाद सिद्वराज ढड्ढा जी ने विरोध् करते हुए नोट लिखा कि “अगर ये व्यवस्था ग्राम सभा के दायरे में नहीं होती है तो ये लोकतन्त्र के लिए सबसे घातक होगा।´´
इसके बाद राजीव गाँधी के समय में संविधान संशोधन का प्रस्ताव आया तो उसमें भी ग्राम सभा की बात नहीं थी। बाद में ग्राम सभाएं आई। अनुच्छेद 273 में लिखा गया कि “ग्राम सभाओं को राज्य का विधनमण्डल वह अधिकार देगा जिससे कि वो स्वायत्त शासन की इकाई के रूप में काम कर सके´´। यहां पर भी वही बात है कि विधानमण्डल ही ताकत देगा कि ग्राम सभाओं को ताकत दी जाए या नहीं। हमारी जो व्यवस्था है वो इस भ्रम है कि वो ग्राम सभाओं को ताकत देगा। ग्राम सभाएं सिर्फ सिफारिश कर सकती हैं और उस पर काम हो या न हो ये ग्राम पंचायत तय करेंगी।
ग्राम सभाओं को कोई नहीं चाहता है। इस पर दिल्ली युनिवर्सिटी की प्रोफेसर मैनन जैन ने एक कविता लिख डाली कि “मुझे कोई नहीं चाहता, मुख्यमंत्री नहीं चाहता, मंत्री नहीं चाहता, कमिश्नर नहीं चाहता और तो और मेरा खुद सरपंच नहीं चाहता´´। ग्राम सभाओं को इसलिए कोई नहीं चाहता कि उसमें झूठ नहीं चल सकता। गांव में एक न एक ऐसा बावला जरूर होगा जो कि पिटता जाएगा और कहता जाएगा कि मैं तो सच बोलूंगा। उसको चाहे कितने जूते लगाओ पर वो तो सच ही बोलेगा। इसीलिए ग्राम सभाओं को नहीं चाहता।
हमने कुछ गांवों में लोगों से सवाल पूछा कि यदि दिल्ली खत्म हो जाए, चण्डीगढ़ खत्म हो जाये तो क्या गांव चलेगा? जवाब मिला कि चलेगा। हमने पूछा कि चलेगा कि दौड़ेगा। तो लोगों ने माना कि दौड़ेगा। गांव समाज राज्य की स्थापना से पहले से था। ये मानना कि राज्यों के बिना ग्राम सभाएं नहीं चलेगी ये सब लोकतान्त्रिक व्यवस्था के खिलाफ है। ग्राम पंचायत राज्य द्वारा बनाई गई है, मान लीजिए पंचायत राज कानून खतम हो जाता है तो ग्राम पंचायत कहां रहेगी. ग्राम सभाएं तो रहेंगी ही। लोकतन्त्र की पहली सीढ़ी ग्राम सभाएं ही है। इसीलिए हमारा नारा है-:
“लोकसभा न विधान सभा, सबसे ऊंची ग्राम सभा´´

ग्रामसभाओं ने बदली गांव की सूरत


ग्रामसभाओं ने बदली गांव की सूरत

आम तौर पर हिंदुस्तान के गांव अपने पिछड़ेपन, गरीबी व बेरोजगारी के कारण ही चर्चा में रहते हैं. पर देश में ऐसे सैकड़ों गांव हैं, जिन्होंने सामुदायिक प्रयास से विकास व संपन्नता हासिल की और अपनी परेशानियां को दूर किया. ऐसे गांव दूसरे गांवों के लिए मिसाल हैं, जो उनसे व वहां के लोगों से कहते हैं कि आप भी आगे आइए और अपने गांव को बदल कर अपना भविष्य संवारिए. पंचायतनामा राज्य और देश के अलग-अलग क्षेत्र में स्थित ऐसे गांवों की खबरें लगातार प्रकाशित करता रहा है. इन गांवों को विकास के रास्ते पर ले जाने वाले लोगों से पंचायतनामा टीम की होती रही बातचीत में एक बात यह भी मालूम हुई कि इन गांवों ने सरकारी पैसे का भरपूर उपयोग किया, सामुदायिक प्रयास किया व सामूहिकता से निर्णय लिया. कुछ ऐसे भी गांव हैं जिन्होंने काफी आर्थिक तरक्की नहीं की है, लेकिन कानून-व्यवस्था से लेकर जल प्रबंधन व आधुनिक खेती के महत्व को समझते हुए विकास की राह पकड़ चुके हैं. एक रिपोर्ट :
पेड़ और पानी से बदल गया पूरा गांव
झारखंड के लातेहार जिले की हेठपोचरा पंचायत का ललगढ़ी गांव. उबड़-खाबड़ भूमि पर बसा यह गांव बहुत संपन्न नहीं है, लेकिन स्वशासन के जरिये लगातार अपनी गरीबी दूर करने की कोशिश कर रहा यह गांव झारखंड में एक मिसाल बन गया है. अनुसूचित क्षेत्र की पंचायत होने के नाते यहां प्रधानी व्यवस्था लागू है. इस गांव के प्रधान रामेश्वर सिंह ही हेठपोचरा के मुखिया भी हैं. रामेश्वर ने गांव में सामुदायिकता को खूब बढ़ाया है. गांव में नशाखेरी व चोरी नहीं होती, न कोई पेड़ काटता है. अगर ऐसा कोई करता है तो उसे ग्रामीणों की बैठक में शर्मसार किया जाता है व  जुर्माना भी लगाया जायेगा. रामेश्वर ने गांव के चारों ओर लगभग 84 हजार पेड़ लगवाये हैं. इसमें ज्यादातर जीवित हैं और अब कई रूप में उसका लाभ गांव को मिल रहा है. इस गांव में मनरेगा से बने 32 कुएं हैं और पांच तालाब है. ये कुएं, तालाब व पेड़ गांव के जलस्तर को बनाये रखने में मददगार हैं. कुओं व तालाब में हर मौसम में पर्याप्त पानी रहता है. इससे यहां अच्छी खेती होती है. गांव की महिलाएं स्वयं सहायता समूह चला कर अपनी आत्मनिर्भरता बढ़ा रही हैं. गांव में अनाज का भी बैंक है और शादी-विवाद या विपत्ति में लोगों को कर्ज देने की भी व्यवस्था है. रामेश्वर सिंह कहते हैं कहते हैं कि अगर हम पेड़ नहीं लगाते तो गांव की गरीबी इस कदर दूर नहीं होती. लोगों को जलावन के लिए सूखी लकड़ियां चुनने की छूट होती है. हरी टहनियां तोड़ने पर रोक है.
ग्रामसभा में निबटा लिये जाते हैं सभी विवाद
कभी अपराध व आतंक के लिए जाने जाना वाला गांव विशनीटीकर अब  बदल गया है. अब इस गांव ने तरक्की की राह पकड़ ली है. गिरिडीह जिले के गांवा प्रखंड के विशनीटीकर ने यह बदलाव ग्रामसभा के जरिये लाया. गावां प्रखंड मुख्यालय से दस किमी की दूरी पर बसा यह गांव पहले काफी पिछड़ा हुआ था, अस्सी और नब्बी के दशक में गांव में इस कदर अपराध था कि लोग इस ओर आने से परहेज करते. अब इस गांव में ग्रामसभा की बैठक होती है और उसमें हर तरह के फैसले लिए जाते हैं. पिछले 18 सालों में ग्रामसभा ने 200 से ज्याद विवाद निबटाया है. विभिन्न जातियों वाले इस गांव की ग्रामसभा अब सिर्फ मामलों का निबटारा नहीं करती, बल्कि गांव के विकास के भी फैसले लेती है. ग्रामसभा के फैसलों का ही परिणाम था कि यहां के लोगों ने पालमो, खां आहर व गुडरी तालाब का निर्माण किया. ग्रामीण सजग हुए तो मनरेगा सहित अन्य सरकारी योजनाओं का भी ज्यादा कारगर लाभ लोग उठाने लगे. गांव में 13 कूप व पांच चापानल लगाये गये. मालडा से नीमडीह तक पक्की सड़क है. ग्रामसभा में ही स्कूल में शिक्षकों की नियुक्ति पर चर्चा होती है और इसका खर्च जनसहयोग से वहन किया जाता है. दस साल पूर्व गांव में बिजली भी आ गयी है.

अक्षम कानून के कारण भ्रष्टाचार की बलि चढ़ा पंचायती राज


 अक्षम कानून के कारण भ्रष्टाचार की बलि चढ़ा पंचायती राज 

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कहने को गांवों में पंचायती राज लागू है। सरकार पंचायती राज के आंकड़े़ गिनाते-गिनाते नहीं थकती। लेकिन सरकार में ही बैठे लोग अलग से यह कहने से नहीं चूकते कि देखिए! पंचायती राज किस तरह भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया है। उनके लिए यह लोकनियंत्रित प्रशासन को असफल बनाने का माध्यम बन गया है। वस्तुत: अभी जो प्रधान या मुखिया बनाए गए हैं उनकी स्थिति मिनी एम.एल.ए. जैसी ही है। जिस तरह एम.एल.ए. पर जनता का नियंत्रण पांच साल में एक बार वोट डालने तक सीमित है उसी तरह गांव में आम जनता की प्रधान के ऊपर कुछ नहीं चलती। कानून के मुताबिक गांव सभा की बैठकें होनी चाहिए लेकिन प्रधान को उसी कानून में इतनी छूट है कि वह अपने कुछ भ्रष्ट साथियों के साथ मिलकर सब खानापूर्ति कर देते हैं। दूसरी तरफ अगर कोई प्रधान ईमानदारी से काम करना चाहे तो उसे इलाके के बीडीओ, एसडीओ, सीडीओ काम नहीं करने देते। गांव के फंड पर इन लोगों का शिकंजा इतना खतरनाक है कि वे चाहें तो गांव की ओर एक पैसा न जाने दें। प्रधान अगर इनके साथ मिलकर बेईमानी करे तो सब कुछ आसान है और अगर ईमानदारी से काम कराना चाहे तो ये उसकी फाइल आगे न बढ़ाएं। इसीलिए ईमानदार से ईमानदार प्रधान भी अपने गांव के फंड को इन अफसरों के चंगुल से नहीं छुटा सकता।ऐसा नहीं है कि देश में ईमानदार लोग प्रधान नहीं चुने जाते हैं। लेकिन देश भर के अनुभवों से यह देखा गया है कि सिर्फ वही ईमानदार प्रधान इन अफसरों की मनमानी पर अंकुश लगा पाए हैं जो वास्तव में अपने सारे फैसले ग्राम सभा में लेते हैं। हालांकि ऐसे प्रधानों की संख्या बेहद सीमित है, लेकिन इनके उदाहरण यह समझने के लिए पर्याप्त हैं कि पंचायती राज को सफल बनाने के लिए उसमें ग्राम सभाओं को किस तरह की कानूनी ताकत चाहिए। लोकराज आंदोलन (स्वराज अभियान) द्वारा समाज, सरकार और कानून के जानकारों के साथ गहन विमर्श के बाद पंचायती राज कानूनों में आवश्यक संशोधन के लिए यह दस्तावेज़ तैयार किया है। इसमें ग्राम सभाओं को मजबूत बनाने के लिए यथासंभव मजबूत कानून की अवधारणा स्पष्ट की गई है- 
  1. वे सभी कार्य जो गांव में किए जाने हैं और जिसका अंतरसंबन्ध् किसी अन्य ग्राम से नहीं है, गांव के स्तर पर ही किए जाएं। (ग्राम पंचायत) वे कार्य जो गांव के स्तर पर नहीं किए जा सकते और जिनका संबन्ध् ऐसे काम जो इस स्तर पर नहीं हो सकता और जिनका संबंध् अन्य गांवों से भी है, उन्हें ब्लॉक स्तर पर किया जाए। (ब्लॉक पंचायत) और जो काम ब्लाक स्तर पर नहीं किए जा सकते और जिनका संबन्ध् एक से अधिक ब्लाक से हो, उन्हें जिला स्तर पर किया जाए (ज़िला पंचायत)। और जो कार्य ज़िला स्तर पर नहीं हो सकते उन्हें राज्य स्तर पर किया जाए (राज्य सरकार)  शासन के हरेक स्तर के लिए ऐसे कार्य की एक सूची बना ली जाए। साथ ही किसी कार्य से सम्बंधित सभी कर्मचारी और धनराशि सम्बंधित स्तर की शासन इकाई के अधीन होगी। 
  2.  इसी तरह, सड़क, गलियां, जन शौचालय इत्यादि जो पूरी तरह किसी एक गांव की सीमा के भीतर हों, उसकी देख-रेख की जिम्मेदारी ग्राम स्तर पर दी जाए। ऐसी संपत्ति जिसका संबंध् एक से ज्यादा गांव से हो, उसकी जिम्मेवारी ब्लॉक को दी जाए। और अगर ऐसी संपत्ति एक से ज्यादा ब्लॉक से सम्बंधित हो तो उसकी ज़िम्मेदारी ज़िला स्तर पर दी जाए तथा एक से अधिक ज़िलों से सम्बंधित होने की स्थिति में उसके रखरखाव आदि की ज़िम्मेदारी राज्य सरकार निभाए। शासन के हरेक स्तर के लिए ऐसी तमाम तरह की संपत्तियों की एक सूची बना ली जाए और इससे सम्बंधित सभी कर्मचारियों, संपत्ति और फंड को सम्बंधित स्तर को सौंप दिया जाए। 
  3. सभी संस्थाएं जैसे स्कूल, अस्पताल, दवाखाना इत्यादि जो किसी एक गांव के निवासियों के लिए है उसे केवल उस गांव के द्वारा ही चलाया जाए। एक से ज्यादा गांव से सम्बंधित संस्थाओं को ब्लॉक चलाए और एक से ज्यादा ब्लॉक से सम्बंधित संस्थाओं को जिला और एक से ज्यादा जिलों से सम्बंधित संस्थाओं को राज्य द्वारा चलाया जाए। शासन के हरेक स्तर के लिए ऐसी संस्थाओं की एक सूची बना ली जाए और इससे सम्बंधित सभी कर्मचारियों, संपत्ति और फंड को सम्बंधित स्तर को सौंप दिया जाए।
  4. राज्य के राजस्व का कम से 50 प्रतिशत हिस्सा, एकमुश्त राशि के रूप में तथा किसी योजना विशेष से संबद्ध किए बगैर ही, सीधे ग्राम पंचायतों को दिया जाए। गांव, ब्लॉक और जिला स्तर की व्यवस्था से सम्बंधित राज्य सरकार की योजनाएं खत्म कर दी जाएं तथा पंचायतों के लिए एकमुश्त राशि प्रदान की जाए।
  5. ग्राम स्तर पर सभी निर्णय ग्राम सभा द्वारा ही लिए जाएंगे। ग्राम सभा द्वारा लिए गए फैसलों के क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी ग्राम सचिव ही होगी। ग्राम सचिव की नियुक्ति, ग्राम सभा द्वारा की जाएगी। ग्राम सभा के निर्णय अंतिम माने जाएंगे, यदि उस निर्णय में कोई तकनीकी त्रुटि न हो या उससे किसी कानून का उल्लंघन न होता हो। यदि ग्राम सभा के किसी निर्णय को ले कर कोई कानूनी विवाद होता है तो इसका निपटारा लोकपाल (ओंबड्समैन) द्वारा किया जाएगा।
  6. ग्राम सभा की बैठक, महीने में कम से कम एक बार अवश्य होगी। बैठक का एजेंडा सचिव द्वारा तय किया जाएगा और बैठक से एक सप्ताह पहले ग्राम सभा के सभी लोगों के बीच इसे वितरित किया जाएगा। ग्राम सभा के सदस्य यदि किसी मुद्दे को एजेंडे में डलवाना चाहें तो बैठक से दस दिन पहले लिखित या मौखिक तौर पर सचिव को दे सकता है। प्रत्येक बैठक की शुरुआत में आपसी सहमति से यह तय किया जाएगा कि मुद्दों पर विचार विमर्श एवं चर्चा का क्रम क्या होगा।
  7. सरकारी कर्मचारियों पर नियंत्रण: इस व्यवस्था में दो तरह के कर्मचारी होंगे:
  • वे कर्मचारी जिनकी नियुक्ति अलग-अलग स्तर के शासन, यथा ग्राम पंचायत, ब्लॉक पंचायत, ज़िला पंचायत आदि द्वारा ही सीधे की गई हो।
  • वे कर्मचारी जिनकी नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की गई थी (लेकिन नई व्यवस्था के तहत) उन्हें ग्राम, ब्लॉक या ज़िला शासन व्यवस्था के अधीन स्थानांतरित कर दिया गया है। गांव, ब्लॉक या जिला शासन व्यवस्था के अधीन ऐसे कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने की स्थिति में उसकी जगह नई नियुक्ति सम्बंधित शासन व्यवस्था के द्वारा की जाएगी।
ग्राम सभा द्वारा निम्नलिखित रूप में सरकारी कर्मचारियों पर नियंत्रण किया जाएगा-
ग्राम सभा, गांव, ब्लॉक या जिला स्तर के किसी भी कर्मचारी के कामकाज से असंतुष्ट होने पर, उसे सम्मान जारी कर सकती है तथा निम्न कदम उठा सकती है-
(क) कर्मचारी को सम्मन जारी कर ग्राम सभा की बैठक में बुलाना तथा उससे स्पष्टीकरण मांगना।
(ख) उपरोक्त स्पष्टीकरण से असंतुष्ट होने की स्थिति में ग्राम सचिव के माध्यम से सम्बंधित कर्मचारी को निर्देश लिखित चेतावनी जारी करना। यह चेतावनी उस कर्मचारी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) में शामिल की जाएगी।
(ग) किसी कर्मचारी का कामकाज संतुष्टिजनक न होने की स्थिति में, उस कर्मचारी के कार्य व्यवहार में सुधार आने की स्थिति तक, ग्राम सभा उस कर्मचारी का वेतन रोकने का फैसला ले सकती है। यदि कर्मचारी का वेतन ब्लॉक या ज़िला स्तर की पंचायत द्वारा दिया जाता है तो, ग्राम सभा सम्बंधित संस्था को इसका निर्देश दे सकती है।
(घ) यदि कर्मचारी का व्यवहार खराब रहता है तो ग्राम सभा, उसे समुचित सुनवाई का अवसर देते हुए, उस पर आर्थिक जुर्माना लगाने का निर्णय ले सकती है।

(ड़) यदि कर्मचारी ग्राम सभा के अधीन है तो ग्राम सभा ऐसे कर्मचारी को नौकरी से निकाल सकती है।8-यदि ग्राम सभा के पास किसी प्रकार की अनियमितता की जानकारी पहुंचती है या किसी अन्य कारण से, ग्राम सभा चाहे तो किसी मामले में जांच करा सकती है। ग्राम सभा चाहे तो इस जांच के लिए अपनी कोई समिति बना सकती है अथवा, किसी सक्षम अधिकारी को जांच के लिए कह सकती है जो एक निश्चित समय सीमा के भीतर जांच रिपोर्ट ग्राम सभा को सौंपेगी। ग्राम सभा इस रिपोर्ट को पूर्णत: अथवा आंशिक रूप से स्वीकार या खारिज कर सकती है या उस पर यथोचित कदम उठा सकती है।
9- राज्य सरकार ग्राम सभा को कार्यालय चलाने के लिए अलग से पैसा उपलब्ध् कराएगी।10- ग्राम सभा के कार्य:-
(क) वार्षिक योजना:- राज्य सरकार के बजट में प्रत्येक ग्राम ब्लॉक और जिला स्तर पंचायत को, राज्य वित्त आयोग द्वारा निर्धारित फॉर्मूला के अनुसार, धनराशि उपलब्ध् कराई जाएगी। ग्राम सभा अपने गांव के लिए वार्षिक योजना बनाएगी। ब्लॉक और जिला स्तर, उस क्षेत्र की ग्राम सभाओं के सुझावों के अनुरुप योजनाएं बनाई जाएंगी। योजनाएं बनाने में प्राथमिकता तय करने का कार्य आपसी सहमति के आधार और सहमति नहीं बनने के हालत में मतदान के जरिए किया जाएगा।
(ख) ग्राम में होने वाले किसी भी काम के लिए भुगतान ग्राम सभा की संतुष्टि बिना नहीं किया जाएगा। यदि ग्राम सभा किसी परियोजना या कार्य से असंतुष्ट हो तो वह भुगतान रोक सकती है, साथ ही खराब कार्य किए जाने का कारण जानने के लिए जांच करा सकती है और इसके लिए जवाबदेही तय कर सकती है।
(ग) ग्राम सभा ये सुनिश्चित करेगी कि गांव में कोई भूखा न रहे, हरेक बच्चा स्कूल जाए और सभी को आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध् हों। इन कार्यों से सम्बंधित योजनाओं और खर्च को ग्राम ब्लॉक और ज़िला स्तर के बजट में प्राथमिकता दी जाएगी। इन कार्यों के लिए ग्राम सभा, केवल राज्य सरकार के बजट पर ही निर्भर नहीं रहेगी। एक समाज के तौर पर यह गांव की ज़िम्मेदारी होगी कि कोई भूखे पेट न सोए, सबके पास एक घर हो, हरेक बच्चा स्कूल जाता हो। आवश्यकता पड़ने पर ग्राम सभा इसके लिए अनुदान भी इकट्ठा कर सकती है।
(घ) सभी को रोज़गार सुनिश्चित करने के लिए ग्राम सभा सभी कदम उठाएगी। पंचायत कार्यों के लिए भुगतान की जाने वाली मजदूरी भी ग्राम सभा ही तय करेगी। हालांकि यह राज्य सरकार द्वारा तय की गई न्यूनतम दैनिक मजदूरी से कम नहीं होगी। ग्राम सभा लोगों को कोई छोटा धंधा शुरु करने के लिए लोन भी दे सकती है या सहकारिता के आधार पर कोई छोटा उद्योग शुरु करने का फैसला ले सकती है या रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए अन्य कोई कदम उठा सकती है।(
च) ऐसे कर जो ग्राम स्तर पर आसानी से वसूले जा सकते हैं उन्हें ग्राम स्तर पर ही वसूला जाएगा, इसी प्रकार ब्लॉक और ज़िला स्तर पर आसानी से इकट्ठा किए जा सकने वाले करों की वसूली भी ब्लॉक एवं ज़िला पंचायतों द्वारा की जाएगी। कुछ कर राज्य सरकार लगाएगी लेकिन उसकी वसूली पंचायत, ब्लॉक या जिला स्तर पर की जाएगी। वहीं, कुछ कर राज्य सरकार द्वारा ही लगाए एवं वसूले जाएंगे। कुछ कर ग्राम, ब्लॉक या जिला स्तर की पंचायतों द्वारा भी लगाए और वसूले जा सकते हैं। ऐसे करों की एक सूची बना कर राज्य सरकार द्वारा  अधिसूचित की जाएगी।
(छ) कृषि उत्पाद मार्केटिंग व्यवस्था और इससे प्राप्त राजस्व पर सीधे ग्राम सभा का ही नियंत्रण होगा।
(ज) ग्राम सभा केवल निर्णय लेगी। उसके क्रियान्वयन या निगरानी सीधे उससे लाभान्वित समूह करेगा। ऐसे लोगों की सभाएं लाभान्वितों की सभा कहलाएंगी और किसी भी मामले की लाभान्वित सभा के निर्णय भी ग्राम सभा की ही तरह मान्यता प्राप्त एवं अधिकृत होंगे।
(झ) राशन दुकान और केरोसीन डिपो का लाइसेंस निरस्त करने और नया लाइसेंस जारी करने का अधिकार भी उस मामले की लाभान्वित सभा के पास रहेगा।
(ट) जरूरत के हिसाब से ग्राम सभा, ब्लॉक या जिला पंचायतें अपने-अपने स्तर पर अतिरिक्त कर्मचारियों जैसे शिक्षक इत्यादि की नियुक्ति कर सकती है एवं नियुक्ति के लिए समुचित नियम शर्तों का निर्धारण भी कर सकेंगी।
(ठ) ग्राम सभा की प्रत्येक बैठक में आखिरी एक घंटे का समय लोगों की व्यक्तिगत शिकायतों को सुनने, उन पर चर्चा करने और उनके समाधान के प्रयास करने के लिए निर्धारित रहेगा।
(ड) ग्राम सभा की 90 प्रतिशत महिला सदस्यों की सहमति के बिना शराब दुकान का लाइसेंस नहीं दिया जाएगा। ग्राम सभा क्षेत्र में चल रही किसी शराब दुकान का लाइसेंस उस ग्राम सभा की महिला सदस्यों के साधारण बहुमत से भी निरस्त किया जा सकेगा।
(ढ़) ग्राम सभा के अधीन भूमि क्षेत्र में किसी औद्योगिक या खनन इकाई लगाने से पहले सम्बंधित ग्राम सभा की अनुमति लेना ज़रूरी होगा। अनुमति देते हुए ग्राम सभा शर्तें भी लगा सकती है। किसी भी शर्त के उल्लंघन होने पर ग्राम सभा को अनुमति निरस्त करने का अधिकार होगा।
(त) ग्राम सभा की सहमति के बिना राज्य सरकार किसी भी जमीन का अधिग्रहण नहीं कर सकेगी। भू-अधिग्रहण कानून के संदर्भ में ग्राम सभा ही (राज्य) के अधिकार प्राप्त होंगे। ग्राम सभा ही भू-अधिग्रहण के लिए नियम और शर्त का निर्धारण करेगी।
(थ) भू-उपयोग में बदलाव भी ग्राम सभा ही तय करेगी।
(द) सभी भूमि हस्तांतरण और सम्बंधित रिकॉर्ड की देख-रेख ग्राम सभा ही करेगी।
(ध्) ग्राम सभा का अपने क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों पर पूरा सामुदायिक नियंत्रण होगा जिस प्रकार पैसा के तहत आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभाओं के पास हैं। पंचायत क्षेत्र में आने वाले सभी प्राकृतिक संसाधन ग्राम सभा के अधीन होंगे।
(न) यदि किसी राज्य में 5 प्रतिशत या उससे अधिक ग्राम सभाएं किसी कानून का प्रस्ताव देती हैं तो राज्य सरकार उस कानून की प्रति सभी ग्राम सभाओं के पास उनकी सहमति के लिए भेजेगी। यदि 50 प्रतिशत से ज्यादा ग्राम सभा इस प्रस्ताव को पारित कर देती है तो राज्य सरकार को वह कानून पास करना होगा। इसी प्रकार ग्राम सभाओं के पास किसी कानून को पूर्णत: या आंशिक तौर पर निष्प्रभावी करने का अधिकार भी होगा।
(प) ग्राम सभा और पंचायत के सदस्यों को, किसी भी सरकारी कर्मचारी से, अपने गांव से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सम्बंधित, सूचना प्राप्त करने का अधिकार होगा। ग्राम सभा इस प्रकार सूचना न उपलब्ध् करने वाले कर्मचारी पर 25000 रुपये तक का जुर्माना लगा सकती है।
11- ब्लॉक और जिला स्तर पंचायत के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव होगा। किसी ब्लॉक के सभी सरपंच ब्लॉक पंचायत के सदस्य होंगे और अपने में से एक का चुनाव ब्लॉक अध्यक्ष पद के लिए कर सकेंगे। सभी ब्लॉक अध्यक्ष जिला पंचायत के सदस्य होंगे और अपने में से किसी एक को जिला अधीक्षक के तौर पर चुनेंगे। सरपंच का कार्य ब्लॉक और गांव के बीच सेतु की भूमिका निभाना होगा। वह ग्राम सभा के निर्णय को ब्लॉक तक और ब्लॉक के निर्णय को ग्राम सभा तक पहुंचाएगा। सरपंच के माध्यम से ग्राम सभा ब्लॉक की गतिविधियों पर नियंत्रण रखेगी। इसी तरह ब्लॉक अध्यक्ष, ब्लॉक और जिले के बीच सेतु का काम करेगा यानि ब्लॉक के निर्णय को जिला पंचायत तक और जिला पंचायत के निर्णय को ब्लॉक पंचायत तक पहुंचाएगा। सरपंच, ब्लॉक और जिला अध्यक्ष, क्रमश: ग्राम, ब्लॉक और जिला सभाओं की बैठकों की भी अध्यक्षता करेंगे।
12-
 कोई भी ग्राम सभा ब्लॉक या जिला पंचायत को किसी मुद्दे या परियोजना पर विचार के लिए कह सकती है। ब्लॉक या जिला पंचायत स्वयं भी अथवा राज्य और केंद्र सरकार के सुझावों पर कोई परियोजना या मुद्दा उठा सकती है। किसी भी मुद्दे या परियोजना को समस्त सम्बंधित विवरण के साथ तथा उसके बारे में ब्लॉक या जिला पंचायत की राय के साथ, उस क्षेत्र की सभी ग्राम सभाओं में उनकी राय जानने ले लिए वितरित किया जाएगा। सामान्यत: किसी मुद्दे पर कोई निर्णय लागू किए जाने से पहले, उससे प्रभावित होने वाली ग्राम सभाओं की सहमति आवश्यक होगी।
13-
 वापस बुलाने का अधिकार- यदि ग्राम किसी सभा के एक तिहाई सदस्य, लिखित रूप से, राज्य निर्वाचन आयोग को सरपंच अपने गांव के सरपंच के प्रति अविश्वास का नोटिस देते हैं तो आयोग उस नोटिस की सत्यता की जांच कराएगा तथा सत्य पाए जाने पर, नोटिस प्राप्त होने के एक महीने के अंदर, गुप्त मतदान कराएगा कि क्या ग्राम सभा के लोग सरपंच को हटाना चाहते हैं।
14- रिकॉर्डस में पारदर्शिता- गांव, ब्लॉक या जिला पंचायत के सभी आंकड़े सार्वजनिक होंगे। प्रत्येक सप्ताह दो निर्धारित दिवसों पर, निश्चित समय पर कोई भी व्यक्ति बिना आवेदन दिए इन रिकॉर्डस को देख सकता है। यदि कोई रिकॉर्ड की कॉपी चाहता है तो वह निरीक्षण के बाद इसके लिए एक आवेदन दे सकता है। आवेदन देने के एक सप्ताह के भीतर साधारण फोटोकॉपी शुल्क ले कर वह रिकार्ड उपलब्ध् करा दिया जाएगा।
15- जिला स्तर पर लोकपाल का गठन -हरेक जिले में एक लोकपाल होगा जो पंचायती राज कानून से सम्बंधित विवाद और समस्याओं का निपटारा करेगा, साथ ही पंचायती राज कानून के प्रावधानों का लागू होना सुनिश्चित कराएगा। इसके पास पर्याप्त अधिकार होंगे ताकि अपने आदेशों को लागू करवा सके। साथ ही कर्मचारियों के खिलाफ सम्मन जारी कर सके। ओंबड्समैन का चुनाव पूर्णत: पारदर्शिता और सहभागिता की प्रक्रिया से होगा। इसके लिए आवेदन मंगाए जाएंगे। सभी आवेदनों पर जनता की राय जानने के लिए इसे वेबसाइट पर डाल दिया जाएगा। इसके बाद जन सुनवाई में सभी आवेदक जनता के सवालों का जवाब देंगे। राज्य के प्रख्यात लोगों (राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता) की एक कमेटी बनाई जाएगी जो सभी आवेदनों की जांच कर राज्यपाल के पास किसी एक नाम की सिफारिश करेंगे