ग्रामसभाओं ने बदली गांव की सूरत
आम तौर पर हिंदुस्तान के गांव अपने पिछड़ेपन, गरीबी व बेरोजगारी के कारण ही चर्चा में रहते हैं. पर देश में ऐसे सैकड़ों गांव हैं, जिन्होंने सामुदायिक प्रयास से विकास व संपन्नता हासिल की और अपनी परेशानियां को दूर किया. ऐसे गांव दूसरे गांवों के लिए मिसाल हैं, जो उनसे व वहां के लोगों से कहते हैं कि आप भी आगे आइए और अपने गांव को बदल कर अपना भविष्य संवारिए. पंचायतनामा राज्य और देश के अलग-अलग क्षेत्र में स्थित ऐसे गांवों की खबरें लगातार प्रकाशित करता रहा है. इन गांवों को विकास के रास्ते पर ले जाने वाले लोगों से पंचायतनामा टीम की होती रही बातचीत में एक बात यह भी मालूम हुई कि इन गांवों ने सरकारी पैसे का भरपूर उपयोग किया, सामुदायिक प्रयास किया व सामूहिकता से निर्णय लिया. कुछ ऐसे भी गांव हैं जिन्होंने काफी आर्थिक तरक्की नहीं की है, लेकिन कानून-व्यवस्था से लेकर जल प्रबंधन व आधुनिक खेती के महत्व को समझते हुए विकास की राह पकड़ चुके हैं. एक रिपोर्ट :
पेड़ और पानी से बदल गया पूरा गांव
झारखंड के लातेहार जिले की हेठपोचरा पंचायत का ललगढ़ी गांव. उबड़-खाबड़ भूमि पर बसा यह गांव बहुत संपन्न नहीं है, लेकिन स्वशासन के जरिये लगातार अपनी गरीबी दूर करने की कोशिश कर रहा यह गांव झारखंड में एक मिसाल बन गया है. अनुसूचित क्षेत्र की पंचायत होने के नाते यहां प्रधानी व्यवस्था लागू है. इस गांव के प्रधान रामेश्वर सिंह ही हेठपोचरा के मुखिया भी हैं. रामेश्वर ने गांव में सामुदायिकता को खूब बढ़ाया है. गांव में नशाखेरी व चोरी नहीं होती, न कोई पेड़ काटता है. अगर ऐसा कोई करता है तो उसे ग्रामीणों की बैठक में शर्मसार किया जाता है व जुर्माना भी लगाया जायेगा. रामेश्वर ने गांव के चारों ओर लगभग 84 हजार पेड़ लगवाये हैं. इसमें ज्यादातर जीवित हैं और अब कई रूप में उसका लाभ गांव को मिल रहा है. इस गांव में मनरेगा से बने 32 कुएं हैं और पांच तालाब है. ये कुएं, तालाब व पेड़ गांव के जलस्तर को बनाये रखने में मददगार हैं. कुओं व तालाब में हर मौसम में पर्याप्त पानी रहता है. इससे यहां अच्छी खेती होती है. गांव की महिलाएं स्वयं सहायता समूह चला कर अपनी आत्मनिर्भरता बढ़ा रही हैं. गांव में अनाज का भी बैंक है और शादी-विवाद या विपत्ति में लोगों को कर्ज देने की भी व्यवस्था है. रामेश्वर सिंह कहते हैं कहते हैं कि अगर हम पेड़ नहीं लगाते तो गांव की गरीबी इस कदर दूर नहीं होती. लोगों को जलावन के लिए सूखी लकड़ियां चुनने की छूट होती है. हरी टहनियां तोड़ने पर रोक है.
कभी अपराध व आतंक के लिए जाने जाना वाला गांव विशनीटीकर अब बदल गया है. अब इस गांव ने तरक्की की राह पकड़ ली है. गिरिडीह जिले के गांवा प्रखंड के विशनीटीकर ने यह बदलाव ग्रामसभा के जरिये लाया. गावां प्रखंड मुख्यालय से दस किमी की दूरी पर बसा यह गांव पहले काफी पिछड़ा हुआ था, अस्सी और नब्बी के दशक में गांव में इस कदर अपराध था कि लोग इस ओर आने से परहेज करते. अब इस गांव में ग्रामसभा की बैठक होती है और उसमें हर तरह के फैसले लिए जाते हैं. पिछले 18 सालों में ग्रामसभा ने 200 से ज्याद विवाद निबटाया है. विभिन्न जातियों वाले इस गांव की ग्रामसभा अब सिर्फ मामलों का निबटारा नहीं करती, बल्कि गांव के विकास के भी फैसले लेती है. ग्रामसभा के फैसलों का ही परिणाम था कि यहां के लोगों ने पालमो, खां आहर व गुडरी तालाब का निर्माण किया. ग्रामीण सजग हुए तो मनरेगा सहित अन्य सरकारी योजनाओं का भी ज्यादा कारगर लाभ लोग उठाने लगे. गांव में 13 कूप व पांच चापानल लगाये गये. मालडा से नीमडीह तक पक्की सड़क है. ग्रामसभा में ही स्कूल में शिक्षकों की नियुक्ति पर चर्चा होती है और इसका खर्च जनसहयोग से वहन किया जाता है. दस साल पूर्व गांव में बिजली भी आ गयी है.
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