Sunday, 19 May 2013

कांग्रेस में राहुल, सपा में अखिलेश, आरजेडी में तेजस्वी, शिवसेना में उद्धाव-आदित्य, डीएमके में स्टालिन-कनीमोझी, एनसीपी में अजित पवार-सुप्रिया सुले, जेडीएस में कुमारस्वामी....। बाकी पार्टियों में भी कमोबेश यही हाल। तो क्या परिवारवा ने राजनीतिक दलों को पुश्तैनी जागीर बना दिया है? राय दें।

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