Thursday, 16 May 2013

परिवार का अर्थ है सम्पूर्ण समर्पण

परिवार का अर्थ है सम्पूर्ण समर्पण 
दुनियां की अनेक व्यवस्थाओ मे से भारतीय समाज व्यवस्था ही एक मात्र ऐसी व्यवस्था है जो त्रिस्तरीय है। साथ ही साथ भारतीय समाज व्यवस्था को इस बात का भी गौरव प्राप्त है कि वह सबसे ज्यादा लम्बे समय तक सफलता पूर्वक चल रही है तथा वह विपरीत परिस्थितियों मे भी लम्बे समय तक टिकी रह सकती है अन्यथा अन्य कोई समाज व्यवस्था नही है जो दूसरी समाज व्यवस्थाओं के इतने आक्रमणों के बाद भी जीवित बच सके।
भारतीय समाज व्यवस्था मे दो मौलिक इकाइयों ‘‘व्यक्ति और समाज‘‘ के बीच एक तीसरी इकाई है जिसे परिवार कहते है। जिस तरह व्यक्ति और समाज को पृथक-पृथक मौलिक अधिकार प्राप्त हैं, उस तरह के मौलिक अधिकार तो परिवार को प्राप्त नही होते किन्तु परिवार भी कोई ऐसी इकाई नही होती जो कुछ व्यक्तियों की साझेदारी से बनता हो अथवा किसी तरह का जोड तोड करके बनाया जा सके। परिवार भी स्वयं मे एक स्वतंत्र अस्तित्व वाली इकाई होती है जो एक विशेष महत्व रखती है।
परिवार व्यवस्था मे परिवार के प्रत्येक सदस्य का सम्पूर्ण समर्पण भाव एक आवश्यक शर्त होती है। यदि परिवार के किसी सदस्य का परिवार मे सम्पूर्ण समर्पण न होकर आंशिक समर्पण भाव हो अथवा दुहरी निष्ठा हो तो परिवार व्यवस्था ठीक से नहीं चल पाती। मेरी मान्यता तो यह है कि परिवार व्यवस्था मे परिवार के प्रत्येक सदस्य को मौलिक अधिकार तो प्राप्त है किन्तु संवैधानिक या समाजिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं। परिवार का सदस्य परिवार मे विलीन होता है । उसकी न तो पृथक से सम्पत्ति हो सकती है न ही पृथक प्रतिबद्धता। उसकी सर्वप्रथम प्रतिबद्धता परिवार के प्रति होती है तथा परिवार की सहमति या अनुमति से ही वह कही और अपनी प्रतिबद्धता जोड सकता है।
अंग्रेजी समाज व्यवस्था मे परिवार का कोई स्वतंत्र अस्तित्व न होकर वह व्यवस्था की एक इकाई होती है। उस व्यवस्था मे परिवार कुछ व्यक्तियो का एक संगठन मात्र है। अंग्रेजों ने परिवार के प्रत्येक सदस्य को मौलिक अधिकारों के साथ-साथ संवैधानिक तथा सामाजिक अधिकार भी प्रदान किये। परिवार मे रहते हुए भी व्यक्ति को व्यक्तिगत सम्पत्ति अलग रखने का अधिकार दे दिया गया। व्यक्ति को परिवार मे रहते हुए भी परिवार की सहमति के बिना पृथक संगठनो मे जुडने का कानूनी अधिकार भी दे दिया गया। प्रत्येक व्यक्ति को दुहरी प्रतिवद्धता की छूट दी गई । स्वाभाविक था कि दुहरी प्रतिबद्धता ने परिवार के अंदर आपसी संदेह का वातावरण बनाया । स्वतंत्रता के बाद तो पाश्चात्य संस्कृति के संवाहक पंडित नेहरू और डा0 भीमराव अंबेडकर ने कुछ ऐसी संवैधानिक व्यवस्था बनाई कि परिवार व्यवस्था को पूरे संविधान से ही बाहर कर दिया। जो काम अंग्रेज बहुत डर-डर कर गुप्त रूप से कर रहे थे वह काम इन दोनो ने मिलकर समाज सुधार के रूप मे शुरू कर दिया। इन दोनो ने मिलकर ऐसी व्यवस्था चलाई कि संयुक्त परिवार व्यवस्था, सम्मिलित परिवार व्यवस्था मे बदल गई । परिवार मे शामिल प्रत्येक सदस्य का अलग से संवैधानिक अस्तित्व भी हो गया तथा अधिकार भी । स्वतंत्रता के तुरंत बाद ही ये दोनो परिवार तोडक समाज सुधारो के लिये इतने उतावले थे कि इन दोनो के लिये ये सुधार सर्वोच्च प्राथमिकता के रूप मे आ गये । अम्बेडकर जी को भारतीय समाज व्यवस्था मे कभी वैसा सम्मान जनक विष्वास प्राप्त नही हुआ और सब कुछ करते हुए भी अम्बेडकर जी उस समय का लोकसभा चुनाव हार गये किन्तु नेहरू जी को सामाजिक विश्वास प्राप्त था। नेहरू जी जब पूरी ताकत से मैदान मे आ गये तब सारी स्थिति बदलती चली गई जो अब तक उसी प्रकार चल रही है।
स्त्री और पुरूष का मिलकर एक साथ रहना एक प्राकृतिक मजबूरी है। ये दोनो पूर्ण समर्पण भाव से एकाकार हो यह संयुक्त परिवार व्यवस्था है। इन दोनो को विशेष परिस्थिति मे ही अलग-अलग होने की छूट थी तथा इस विटो का उपयोग भी असामाजिक कार्य ही माना जाता था। स्त्री पुरूष का एक साथ जुडना दो परिवारो का जुडन माना जाता था न कि दो व्यक्तियो का । नेहरू जी तथा अम्बेडकर जी ने इन दोनो को दो बालिग व्यक्तियो का स्वतंत्र अधिकार बना दिया । विशेष स्थितियो मे मजबूरी के वीटो अधिकार को खिलवाड के रूप मे मान लिया। पाश्चात्य संस्कृति स्त्री और पुरूष के जुडने को आपसी समझौता मानती है और इस्लाम पुरूष द्वारा महिला का उपयोग। भारतीय संस्कृति इन सबसे अलग दो इकाइयो का विलीनीकरण देखती है जो एक दूसरे को अपना स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त करके एक परिवार रूपी स्वतंत्र इकाई का स्वरूप देना है । मै मानता हॅू कि जो कुछ पुराना है वह सब आख मूंदकर मानने योग्य नही है। लेकिन साथ ही मै यह भी मानता हूं कि जो कुछ पुराना है वह आंख मूंदकर बदलने योग्य भी नही हैं। कई मामलों मे पुराना आज की अपेक्षा बहुत अविकसित रहा है तो कई मामलो मे आज की अपेक्षा कई गुना ज्यादा विकसित। नेहरू जी तथा अम्बेडकर जी सारे पुराने को संशोधन योग्य और सारे नये को स्वीकार करने की भूल कर बैठे। यही भूल परिवार व्यवस्था को तोडने का आधार बनी। इन दोनो ने सबसे पहले परिवार व्यवस्था को तोडने की पहल स्वयं से ही शुरू की । स्वतंत्रता के बाद इन्होने अपने-अपने परिवारो मे पारंपरिक विवाह प्रणाली को तोडकर व्यक्तिगत विवाह प्रणाली को बढावा दिया। वे दोनो चाहे अपने-अपने परिवारो मे नई प्रणाली को लागू करके आज जितने प्रसन्न होते, किन्तु मै तो अब भी पारंपरिक विवाह प्रणाली को प्रेम विवाह प्रणाली पर वरीयता देने का पक्षधर हूं। मेरे विचार से प्रेम विवाह दो सहमत स्त्री पुरूषों का विशेषाधिकार है। किन्तु वह आदर्श स्थिति नहीं। ये दोनो यदि प्रेम विवाह को मान्यता देने तक सीमित होते तो वह अच्छी स्थिति हो सकती थी किन्तु प्रेम विवाह को प्रोत्साहित करना इन दोनो की नीयत पर संदेह पैदा करता है। आज की राजनैतिक व्यवस्था प्रेम विवाहो को प्रोत्साहित करने का जो प्रयास कर रही है उनसे निःसंदेह परिवार व्यवस्था को गंभीर क्षति पहुंची है। देश मे अनुशासन आवश्यक है । मंत्रीपरिषद की संयुक्त जिम्मेदारी होगी । किसी राजनैतिक दल से जुडा सांसद यदि संसद मे स्वतंत्र वोट देगा तो संसद सदस्यता रद्द। किसी राजनैतिक दल का सदस्य सार्वजनिक रूप से दल के विरूद्ध कुछ बोल दे तो अनुशासन की कार्यवाही संभव। किन्तु किसी परिवार का सदस्य परिवार की इच्छा के विरूद्ध विवाह कर ले तो कोई अनुशासन हीनता नही। यदि उसे रोकने का प्रयास हो तो परिवार तोडक बिग्रेड उसके समर्थन मे बिना बुलाये तैयार। परिवार तोडक बिग्रेड के बनाये कानून उसे संरक्षण देंगे और जरूरत पडे तो अनुशासन हीनता के लिये पुरस्कृत भी करेंगे।
नेहरू जी और अम्बेडकर जी धर्म को अफीम मानते थे। यह उनका अधिकार है कि वे किसी धर्म से जुडे या न जुडे। किन्तु उन दोनो को यह भी पता होना चाहिये कि परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था का हिस्सा है, धर्म व्यवस्था का नही। धर्म और समाज बिल्कुल भिन्न इकाइयां हैं। कोई भी व्यक्ति धर्म तो बदल सकता है किन्तु समाज नही । इन दोनो ने समाज व्यवस्था को भी तोडा और परिवार व्यवस्था को भी। यदि परिवार व्यवस्था, व्यक्ति को अनुशासन, सहजीवन, सम्पूर्ण समर्पण की ट्रेनिंग दे देती तो राज्य व्यवस्था को बहुत सुविधा होती। लेकिन इन दोनो ने ऐसे प्रयत्न किये कि परिवार व्यवस्था धीरे-धीरे समाप्त हो जावे। यदि इन्कम टैक्स कानूनों को ठीक से समझा जावे तो वह पूरा का पूरा परिवार व्यवस्था को तोडने वाला कारखाना दिखता है। पति-पत्नी आपसी व्यवहार संबंधी बने हुए तथा लगातार बन रहे कानून इसी दिशा मे लगातार सक्रिय है। यहां तक कि अब तो माता पिता और पुत्र के बीच के संबंध मे भी कानून घुसने का प्रयास कर रहा है। यदि कानून को वकीलो के व्यावसायिक हितो से दूर हटकर, सीधा सरल सपाट बनाया जाता तथा परिवार व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता देकर व्यक्ति को परिवार का तथा परिवार को समाज का हिस्सा मान लिया जाता तो सम्भवतः अनेक समस्याए स्वतः कम हो गई होती। मै पहले भी मानता था और अब तो बहुत ज्यादा पक्षधर हूं कि परिवार व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता देकर तथा अनावश्यक कानूनों से मुक्त करके अनेक समस्याओ को रोका जा सकता है। इस दिशा मे विचार मंथन होना चाहिये।

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