Friday, 17 May 2013

“अंधेर नगरी चौपट राजा”


“अंधेर नगरी चौपट राजा”

अगर हम देश में वर्तमान हालातों से खुश हैं,तो समझ जाइये हम इनसे बदतर हालातों को न्योता दे रहे हैं।।एक औसत दर्जे की बुद्धि का व्यक्ति इस वक़्त देश में चल रही घोर उथलपुथल से व्यथित होगा।।न कोई राजनैतिक स्थिरता,न कोई लोकतंत्र का सम्मान,सब प्राक्रतिक आपदा से भी ज्यादा विनाशकारी है।.पर प्राकृतिक आपदाएं मनुष्य के नियंत्रण से बाहर होती हैं,और देश में चल रही कृत्रिम और मानव रुपी समस्याओं का समाधान हमारे अपने हाथ में है।।इस देश का भाग्य शुरू से ही खोटा रहा है।।ब्रिटिश हुकूमत के आने से पहले अंदरूनी बिखराव इस कदर था,कि इसी ने बाहरी ताकतों को अन्दर प्रवेश करने का खुला नियंत्रण दिया।लोग आये,हमे लूट खसोट कर चले गए।।बहुत पीड़ा सही देश ने।।देश की प्राक्रतिक,राजनैतिक,आर्थिक,सांस्कृतिक अस्मत को चीर दिया गया।।पर हम उस पीड़ा को महसूस तो करते रहे,सहते भी रहे,लेकिन उसका कैसे इलाज़ किया जाए ये नही सोच पाए।।थोडा जो कुछ बचा कुचाकर देश 1947 में आया।।बैसाखी पकड़ कर धीरे धीरे आगे भी बढ़ा,पर ये क्या इसने तो बैसाखी से चलने को ही भाग्य बना लिया।।।लडखडाता,ठोकर खाता,शायद एक बार को गिरता,पर देर सवेर पैरों पर तो खड़ा होता।।अब बारी आई शरीर में ज़ख्म पड़ने की,और उनके सड़ने की।।।इसमें क्या मुश्किल था।।बंद चीज़ पर तो फफूंदी छाती ही है।।पहले सामजिक कुरीतियाँ,फिर यही राजनीति में घुस गयी।।फंगस शुरू।।साम्प्रदायिकता,धर्मान्धता,कट्टरपन,नक्सलवाद,अलगाववाद,भ्रष्टाचार,एक के बाद एक घाव होता गया,सड़ता गया।।हिन्दू को डर है अपने धर्म के लुटने का,मुस्लिम को खौफ है अपने अल्पसंख्यक शोषण का।।औरत को ऐसे नौच खसौटा जा रहा है जैसे मेमने को चील,इंसान इंसान को छू ने को राज़ी नही,उसके शरीर का सोना झड जाएगा,हर किसी के हाथ दूसरे की जेब में रेजगारी ढूंढ रहे है,नगर तिजोरी की चाबी राजा के पास,वसूली वो करे,खर्च जनता।।।।”अंधेर नगरी चौपट राजा”।।।पर अब मुझे चिंता होती है।।।सिर्फ कमियाँ बताना हल नही,फिर मुझसे बड़ा कोई दोषी नही।।।मेरी इतनी बिसात तो नही कि अकेले सर्जरी कर दूं,पर हाँ इतनी औकात तो है की मरहम पट्टी कर दूं,प्रथम उपचार कर दूं।।।पता है समस्या यही है हम उतना भी नही करते जितना हमारे वश में है,हम उतना भी नही करते।।हर कोई दूसरे के कंधे पर चढ़कर कुम्भ नहाना चाहता है।।।।।बस भी करो।।।पहले भी कहती रही हूँ की देश के हित की लड़ाई को एक रिले दौड़ बना दीजिये,कोई थकेगा भी नही,गिरेगा भी नही।।।एक का सहारा दूसरा,दूसरे का तीसरा,चौथा,पांचवा।।।।हम अपनी सफाई रोज़ करते हैं,घर की सफाई भी हर दीवाली कर ही लेते हैं,और जब बात देश की आती है,तो सदियाँ बीत गयी पर जाले नही हटाये।।देश में आप रहे हैं,देश आपमें नही,हमारे ख़त्म होने से ये फिर भी बच जाएगा,पर अगर ये मुश्किल में पड़ा तो हमारा विनाश पक्का है।।।।उठो,लड़ो,और जीतो।।।।और कोई चारा भी नही।।।।

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