खनिजों से बढ़ती समृध्दि छत्तीसगढ़ की
प्रकृति ने खुले हाथों से छत्तीसगढ़ की धरती को विभिन्न प्रकार के खनिजों का बेशकीमती भण्डार उपहार में दिया है। हजारों वर्ष पहले भी छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल के आदिवासी विशेष प्रकार के पत्थरों से लोहा बनाने की कला जानते थे। आज यह कला डोकरा शिल्प (बेलमेटल हस्तशिल्प) के रूप में निरंतर पुष्पित और पल्लवित हो रही है। ऐसा लगता है यहां के कुछ गांवों के नामों का संबंध वहां मिलने वाली खनिज संपदा से भी रहा है, जैसे शहीद वीरनारायण सिंह की जन्मभूमि रायपुर जिले के सोनाखान में खनिज सर्वेक्षण के आधार पर वहां सोने के दो हजार 780 किलोग्राम भण्डार प्रमाणित किए गए है। मानव सभ्यता के विकास और धीरे-धीरे नयी-नयी तकनीकों की खोज के साथ ही छत्तीसगढ़ की खनिज सम्पदा और भी अधिक चमक के साथ उभरकर सामने आने लगी है। हाल ही में प्रदेश में कबीरधाम, राजनांदगांव, उत्तर बस्तर (कांकेर )और दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा) में लौह अयस्क के लगभग 2639 लाख टन भंडार, सरगुजा जिले के भटगांव, शंकरगढ़, कोरबा जिले के हरदी करताली, पूटा, सैला, रायगढ़ जिले के गारेपेलमा आदि क्षेत्रों में लगभग 2980 लाख टन कोयले के भंडार, जांजगीर-चांपा जिले के भैंसों मदनपुर में डोलोमाइट के 100 लाख टन, बस्तर जिले रेंगानार, मरकानार और बासनपुर क्षेत्र में टीन खनिज के लगभग 13 लाख टन के अतिरिक्त भण्डार खोजे गए हैं। इसी प्रकार जशपुर जिले के पेण्ड्रापार्क, सरगुजा जिले के मैनपाट और कबीरधाम जिले के दरई क्षेत्र में बाक्साइट के नये भण्डार खोजे जा रहे हैं। रायपुर, राजनांदगांव, दुर्ग, कबीरधाम और बस्तर जिले में चूना पत्थर के कुल 7664 लाख टन के भण्डार प्रमाणित किए गए हैं। लगातार नये-नये खनिज भण्डारों की खोज से छत्तीसगढ़ में खनिजों के खजाने की समृध्दि बढ़ती जा रही है।
देश की आजादी के बाद छत्तीसगढ़ के भिलाई में स्थापित इस्पात संयंत्र पूरे देश का गौरव है। छत्तीसगढ़ के बालको में देश का सबसे बड़ा एल्यूमिनियम कारखाना स्थापित किया गया है। इन दोनों कारखानों में विस्तार परियोजना का कार्य किया जा रहा है। नये राज्य के गठन के साथ ही प्रदेश में खनिजों के नये-नये भण्डारों की खोज के काम में तेजी आयी है। उत्तम गुणवत्ताा के खनिज भण्डारों की खोज के साथ छत्तीसगढ़ में खनिज आधारित उद्योगों का भी विकास प्रारंभ हुआ। राष्ट्रीय खनिज विकास निगम ने छत्तीसगढ़ में लौह अयस्क खदानों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। बस्तर की बैलाडीला की खदानों में विश्व की उत्तम कोटि का लौह अयस्क पाया जाता है। बस्तर का लोहा अपनी उत्तम गुणवत्ता के कारण चीन और जापान तक जाता है। राज्य सरकार की पहल पर एन.एम.डी.सी. द्वारा नगरनार में एकीकृत इस्पात संयंत्र स्थापित होने जा रहा है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में पिछले वर्षो में प्रदेश में खनिजों के उत्पादन और राज्य में मिलने वाले खनिज राजस्व में उल्लेखनीय वृध्दि दर्ज की गयी है। वर्ष 2000-2001 में खनिजों से मिलने वाला राजस्व 429.96 करोड़ रुपए था, जो वर्ष 2011-12 में बढ़कर 2737.25 करोड़ रुपए हो गया है। वर्ष 2012-13 में खनिज राजस्व के निर्धारित लक्ष्य 3105 करोड़ रुपए के विरुध्द माह दिसम्बर 2012 तक लगभग 2155 करोड़ रुपए खनिज राजस्व प्राप्त किया जा चुका है। जो कुल लक्ष्य का 69.41 प्रतिशत है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का इस बात पर जोर है कि प्रदेश में जिन खनिजों का उत्पादन होता है, उनमें वेल्यु एडीशन भी राज्य में ही हो, जिससे यहां के लोगों को रोजगार के अधिक से अधिक अवसर मिलें और खनिजों की रायल्टी के अलावा खनिजों से निर्मित वस्तुओं के विक्रय से विक्रय कर के रुप में भी राज्य सरकार को राजस्व मिले। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के लगातार प्रयासों से राज्य सरकार को लौह अयस्क की रायल्टी की दर उसके विक्रय मूल्य के आधार पर निर्धारित कराने में सफलता मिली है। डॉ. सिंह ने इसके लिए कई बार केन्द्र सरकार से आग्रह किया था। अंतत: केन्द्र सरकार द्वारा 17 अगस्त 2009 से लौह अयस्क की रायल्टी सत्रह रुपए से बढ़ाकर 230 रुपए करने तथा चूना पत्थर और डोलोमाइट की रायल्टी दर 45 रुपए प्रति मीटरिक टन से बढ़ाकर 63 रुपए करने के संबंध में अधिसूचना जारी की गयी। रायल्टी दरों में वृध्दि से राज्य सरकार को मिलने वाले खनिज राजस्व में भी काफी इजाफा हुआ है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह छत्तीसगढ़ में विभिन्न अयस्कों के खनन के क्षेत्र में कार्यरत सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों से उनके लाभ के 26 प्रतिशत के बराबर राशि स्थानीय क्षेत्र विकास पर खर्च करने की मांग कर रहे हैं। यदि केन्द्र सरकार द्वारा यह मांग मान ली जाती है, तो विकास कार्यों के लिए राज्य सरकार को अच्छे संसाधन उपलब्ध हो सकेंगे। एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2011-12 में राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एन.एम.डी.सी.) द्वारा लगभग 7,265 करोड़ रूपए, दक्षिण पूर्व कोयला प्रक्षेत्र (एस.ई.सी.एल.) द्वारा लगभग 5975 करोड़ रूपए और भिलाई स्टील प्लांट द्वारा लगभग 2715 करोड़ रूपए का मुनाफा कमाया है। छत्तीसगढ़ में निजी क्षेत्र की कम्पनी जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड ने भी वर्ष 2011-12 में लगभग 9825 करोड़ रूपए का लाभ अर्जित किया है। यदि ये सभी कम्पनियां अपने मुनाफे का 26 प्रतिशत स्थानीय विकास पर खर्च करती है, तो खदान के आसपास के क्षेत्रों का कायाकल्प हो सकता है। मुख्यमंत्री ने 23 अप्रैल 2013 को जगदलपुर में आयोजित बस्तर एवं दक्षिण क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण की बैठक में केन्द्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रम राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एन.एम.डी.सी.) से छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल बस्तर राजस्व संभाग में संचालित उनकी परियोजनाओं में तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के रिक्त पदों की भर्ती में शत-प्रतिशत स्थानीय युवाओं को मौका देने की मांग की है। भारत का कुल 16 प्रतिशत खनिज उत्पादन छत्तीसगढ़ में होता है। देश के खनिज उत्पादक राज्यों में छत्तीसगढ़ तीसरे स्थान पर है। यहां कोयला, लौह अयस्क, टिन, बाक्साइट, चूना पत्थर, डोलोमाइट, हीरा, फलोराइट, संगमरमर, स्वर्ण, एलेक्जेन्ड्राइट और कोरण्डम आदि 28 प्रकार के विभिन्न प्रकार के खनिजों के भण्डार हैं। वित्तीय वर्ष 2011-12 में प्रदेश में 16 हजार 291 करोड़ रुपए मूल्य के खनिजों का उत्पादन किया गया।
आज छत्तीसगढ़ देश के कोयला उत्पादक राज्यों में प्रथम स्थान पर है। छत्तीसगढ़ में 50 हजार 846 मिलियन टन कोयले के प्राकृतिक भण्डार है, जो देश के कोयला भण्डार का 17.32 प्रतिशत है। राष्ट्र के कोयला उत्पादन में छत्तीसगढ़ की सहभागिता 21.10 प्रतिशत है। वर्ष 2011-12 में प्रदेश में लगभग पांच हजार 830 करोड़ रूपए लागत के लगभग एक हजार 139 लाख टन कोयले का उत्पादन हुआ। छत्तीसगढ़ इस्पात उद्योग में प्रमुखता से उपयोग किए जाने वाले डोलोमाइट खनिज के उत्पादन में भी देश में प्रथम स्थान पर है। छत्तीसगढ़ में 847 मिलियन टन डोलोमाइट के भण्डार हैं, जो देश में उपलब्ध डोलोमाइट के भण्डारों का 11.24 प्रतिशत है।
छत्तीसगढ़ देश में एल्युमिनियम धातु का भी सबसे बड़ा उत्पादक है। यहां कोरबा शहर में देश का सबसे बड़ा बाल्को का एल्युमिनियम प्लांट स्थापित है। छत्तीसगढ़ में एल्युमिनियम के प्रमुख अयस्क बाक्साईट के 148 मिलियन टन के भण्डार उपलब्ध है। देश के बाक्साईट उत्पादन में छत्तीसगढ़ का हिस्सा 18.37 प्रतिशत है। छत्तीसगढ़ मिनरल डेव्हलपमेंट कार्पोरेशन द्वारा राज्य के सरगुजा, बलरामपुर और कबीरधाम जिलों में बाक्साईट का उत्पादन किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ देश में टिन अयस्क का उत्पादन करने वाला एक मात्र राज्य है। सामरिक महत्व के इस अयस्क के राष्ट्रीय भण्डार में 37.69 प्रतिशत का योगदान छत्तीसगढ़ का है। इस खनिज का उत्पादन दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा) जिले में छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम द्वारा किया जा रहा है। वर्ष 2011-12 में दो अरब 67 करोड़ रूपए मूल्य के 48 हजार 971 किलोग्राम टिन अयस्क का उत्पादन हुआ। टिन अयस्क का क्रय आदिवासियों की सहकारी समितियों के माध्यम से किया जा रहा है। देश के लौह अयस्क उत्पादक राज्यों में छत्तीसगढ़ तीसरे स्थान पर है। वर्ष 2011-12 में छत्तीसगढ़ में नौ हजार 642 करोड़ रूपए लागत के 304.55 लाख टन लौह अयस्क का उत्पादन हुआ था। प्रदेश के दंतेवाड़ा, बालोद, कांकेर, राजनांदगांव जिले में लौह अयस्क उत्पादन हो रहा है। बालोद जिले के दल्लीराजहरा से दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा) जिले के बैलाडीला तक की पर्वत श्रृंखलाओं में दो हजार 731 मिलियन टन लौह अयस्क के भण्डार मौजूद है, जो देश के उपलब्ध भण्डारों का 18.67 प्रतिशत है। छत्तीसगढ़ में देश के 18.21 प्रतिशत लौह अयस्क का उत्पादन होता है। लौह अयस्क का उत्पादन सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) द्वारा बैलाडीला की खानों में और भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा बालोद जिले की दल्लीराजहरा की खदानों में किया जा रहा है। प्रदेश में चूना पत्थर के भी विपुल भण्डार है, जिसकी वजह से प्रदेश में बड़ी कम्पनियों द्वारा मेगा सीमेंट प्लांट स्थापित किए जा रहे हैं। प्रदेश में लगभग नौ हजार 38 मिलियन टन चूना पत्थर के भण्डार मौजूद है। वर्ष 2011-12 में 312 करोड़ रूपए मूल्य के लगभग 201 लाख टन चूना पत्थर का उत्पादन किया गया। ग्रासिम, लाफार्ज, अल्ट्राट्रेक, अंबुजा और सेंचुरी सीमेंट के संयंत्र स्थापित हैं। चूना पत्थर का सर्वाधिक उत्पादन बलौदाबाजार जिले में किया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के मैनपुर क्षेत्र में हीरा खनिज की मातृशिला किम्बरलाइट के छह पाइप बेहराडीह, पायलीखण्ड, जांगड़ा, कोदोमाली, कोसमबुड़ा और बेहराडीह टेम्पल क्षेत्रों में चिन्हित किए गए हैं। इनमें से बेहराडीह तथा पायलीखण्ड क्षेत्र के किम्बरलाइट पाइप में हीरे की उपस्थिति प्रमाणित हो चुकी है। महासमुन्द और रायगढ़ जिलों में भी हीरे की मातृशिला किम्बरलाइट की उपस्थिति प्रमाणित की गई है। जशपुर जिले के बरजोर-तपकरा क्षेत्र में नदियों की रेत में सोने के कण पाये जाते है। प्रारंभिक सर्वेक्षण के दौरान 25 किलोग्राम जलोढ़ स्वर्ण (प्लेसर गोल्ड) के भण्डार मिलने की संभावना बनी है। उत्तर बस्तर (कांकेर) और रायगढ़ जिले में भी सोना मिलने के संकेत मिले हैं। गरियाबंद जिले के सेंदमुड़ा (देवभोग) क्षेत्र में दुर्लभ एवं बहुमूल्य खनिज एलेक्जेन्ड्राइट, इसी जिले के देवभोग क्षेत्र के गोहेकला, धूपकोट, लाटापारा तथा कादुवन क्षेत्रों में एब्रेसिव उद्योग में उपयोग किए जाने वाला गार्नेट अयस्क पाया जाता है। इसका उपयोग आभूषणों में भी होता है। छत्तीसगढ़ में लगभग 30 हजार टन गार्नेट के भण्डार मौजूद है। दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा) और बीजापुर जिले के भोपालपटनम क्षेत्र में 885 टन कोरण्डम के भण्डार अनुमानित किए गए हैं। महासमुन्द जिले के चुराकुट्टा, मकरमुत्ता, घाटकछार आदि गांवों के आसपास फ्लोराइट खनिज के भण्डार चिन्हित किए गए है। राजनांदगांव जिले में चांदीडोंगरी के आसपास फ्लोराइट के निक्षेप मिले हैं। राजनांदगांव जिले के बोरतालाब और पनियाजोब गांवों के आसपास क्वार्टज खनिज तथा कोरिया जिले के वामपुरा, नवापारा तथा विश्रामपुर क्षेत्रों में फायरक्ले खनिज पाया जाता है। इसका उपयोग सिरेमिक उद्योग में किया जाता है। दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा) जिले में सिलिमेनाइट और बस्तर जिले में सोपस्टोन के निक्षेप मिले हैं। प्रदेश में रेत तथा बजरी पत्थर, मिट्टी और मुरूम जैसे गौण खनिजों का उत्पादन किया जाता है। प्रदेश में रेत का खनन सुनियोजित ढंग से करने तथा पंचायतों के लिए अतिरिक्त आय के साधन जुटाने की दृष्टि से राज्य शासन द्वारा एक अप्रैल 2006 से रेत के उत्खनन और व्यवसाय के अधिकार पंचायत, जनपद पंचायत तथा नगरीय निकायों को दिए गए हैं। रेत पर बीस रूपए प्रति घनमीटर की दर से रायल्टी निर्धारित की गई है। रायल्टी से प्राप्त राशि सीधे तौर पर पंचायतों और नगरीय निकायों को प्राप्त हो रही है। राज्य शासन द्वारा एक जनवरी 2011 से गौण खनिज से प्राप्त राजस्व के 33 प्रतिशत की समतुल्य राशि पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को तथा 67 प्रतिशत की समतुल्य राशि पंचायत एवं स्थानीय निकायों को वितरण का प्रावधान किया गया है।
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